क्या है हमारे दुखो का कारण, हमारी इच्छायें, वासनायें या फिर कुछ और…

वर्तमान में जहां देखिए वहां अंधी दौड़ जारी है। तरह-तरह की अंधी दौड़ों में कुछ पाने के चक्कर में पूरा जीवन जाया हो रहा है। इन अंधी दौड़ों में मनुष्य को यह अहसास ही नहीं हो पाता कि उसकी वास्तविक पहचान ज्यादा पैसा,बड़ा नाम, प्रतिष्ठित पद या अन्य भौतिक वस्तुओं के कारण नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता से है।

मनुष्य कितनी अधिक मात्रा में भौतिक संपदा क्यों न जोड़ ले, वह उसके साथ नहीं जाती है। वह खाली हाथ यहां आया था और खाली हाथ ही विदा होगा। जब किसी का निधन होता है तो लोग उसके बारे पूछते हैं कि अमुक शख्स ऐसा था या वैसा था? इसका आशय यही होता है कि अमुक व्यक्ति बौद्धिक गुणों से युक्त था।

संवेदनशील, मृदुभाषी, संतोषी, परोपकारी था या फिर अहंकारी, अभिमानी, पतित, षड्यंत्रकारी, भ्रष्टाचारी आदि था? कहने का मतलब यही है कि मनुष्य का जीवन अंधी दौड़ों में खर्च करने में नहीं, बल्कि बौद्धिक गुणों का विकास करने के लिए है। हमारे ग्रंथों और साहित्य में जीवन का सार है सादा जीवन, उच्च विचार। अर्थात जिसका जीवन साधारण, लेकिन विचार उच्च हों वही पवित्र और संतोषी है। आज के जीवन में जो असंतोष, हड़बड़ी, मारामारी,व्यर्थ की भागदौड़, ईष्र्या, तनाव, रोग, शोक आदि हैं, वे सादा जीवन, उच्च विचार के अभाव से हैं।

हमारी इच्छाओं और वासनाओं का कोई अंत नहीं है और ये ही हमारे सभी दुखों का मूल कारण हैं। विकास और तरक्की की अंधी दौड़ ने हमें दुनिया के बहुत करीब कर दिया, लेकिन हमारे अपनों से ही हमें दूर कर दिया। हम भीड़ में अकेले रह गए हैं। हमारे आसपास सुख-सुविधाओं का अंबार लगा है, लेकिन फिर भी हम अंदर से अशांत हैं। हम समय से आगे निकलने की चाह में इंसान भी नहीं रह पाए। हमारी बुद्धि का इतना विकास हो गया कि भावनाएं खत्म गईं।

विज्ञान के युग में हम ज्ञान से लबरेज हो गए, लेकिन हमारा जीवन ज्ञान कोरा हो गया। दुनिया एक गांव में सिमट रही हो, लेकिन मानवता की दुनिया हमसे कहीं दूर चली गई।शायद हम यह भूल गए हैं कि शांति और संतोष पाने के लिए हमें किसी दौड़ में शामिल नहीं होना होता, बल्कि वे हमारे भीतर ही हैं। यदि हम शांत होकर अपने भीतर झांकें तो हमें वह खजाना मिल सकता है जो दुनिया की हर धन-दौलत से बढ़कर है। बस उसे पाने के लिए हमें अपना ही साक्षात्कार करना होता है।

चाणक्य नीति
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