नन्द के घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

हिन्दु पौराणिक कथा के अनुसार कृष्ण का जन्म, मथुरा के असुर राजा कंस, जो उसकी सदाचारी माता का भाई था, का अंत करने के लिए हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म पर मनाया जाने वाला पावन पर्व जन्माष्टमी भारत भूमि पर मनाया जाने वाला ऐसा त्योहार है जिसे अब सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में कई स्थानों पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं. हिन्दुओं का यह त्यौहार श्रावण मास (अमूमन जुलाई या अगस्त) के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मनाया जाता है।

हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्ण का जन्म, मथुरा के राजा कंस का अंत करने के लिए हुआ था। कंस श्रीकृष्ण की माता देवकी का सगा भाई था। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है। इस बार जन्माष्ठमी २२ अगस्त को है। जन्माष्टमी के अवसर पर पुरूष व औरतें उपवास व प्रार्थना करते हैं। मन्दिरों व घरों को सुन्दर ढंग से सजाया जाता है व प्रकाशित किया जाता है। उत्तर प्रदेश के वृन्दावन के मन्दिरों में इस अवसर पर खर्चीले व रंगारंग समारोह आयोजित किए जाते हैं। कृष्ण की जीवन की घटनाओं की याद को ताजा करने व राधा जी के साथ उनके प्रेम का स्मरण करने के लिए रास लीला की जाती है। इस त्यौहार को कृष्णाष्टमी अथवा गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। बालकृष्ण की मूर्ति को आधी रात के समय स्नान कराया जाता है तथा इसे हिन्डौले में रखा जाता है।

पूरे उत्तर भारत में इस त्यौहार के उत्सव के दौरान भजन गाए जाते हैं व नृत्य किया जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दौरान, कृष्ण के द्वारा बचपन में लटके हुए छींकों (मिट्टी की मटकियों), जो कि उसकी पहुंच से दूर होती थीं, से दही व मक्खन चुराने की कोशिशों करने का उल्लासपूर्ण अभिनय किया जाता है। इन वस्तुओं से भरा एक मटका अथवा पात्र जमीन से ऊपर लटका दिया जाता है, तथा युवक व बालक इस तक पहुंचने के लिए मानव पिरामिड बनाते हैं और इसे फोड़ डालते हैं।

श्रीकृष्ण के अभिन्न सखा थे पांडुपुत्र अर्जुन
इन्द्र के अंश से उत्पन्न महावीर अर्जुन वीरता, स्फूर्ति, तेज एवं शस्त्र संचालन में अप्रतिम थे। पृथ्वी का भार हरण करने तथा अत्याचारियों को दण्ड देने के लिए साक्षात भगवान नरनारायण ने ही श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतार लिया था। यद्यपि समस्त पाण्डव श्रीकृष्ण के भक्त थे, किंतु अर्जुन तो भगवान श्याम सुंदर के अभिन्न सखा तथा उनके प्राण ही थे। वीरवर अर्जुन ने अकेले ही द्रुपद को परास्त करके तथा उन्हें लाकर गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में डाल दिया।

इस प्रकार गुरु की इच्छानुसार गुरु दक्षिणा चुका कर इन्होंने संसार को अपने अद्भुत युद्ध कौशल का प्रथम परिचय दिया। अपने तप और पराक्रम से इन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न करके पाशुपास्त्र प्राप्त किया। दूसरे लोकपालों ने भी प्रसन्न होकर इन्हें अपने- अपने दिव्यास्त्र दिये। देवराज के बुलाने पर वे स्वर्ग गये तथा अनेक देव विरोधी शत्रुओं का दमन किया। स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी के प्रस्ताव को ठुकराकर उन्होंने अद्भुत इन्द्रिय संयम का परिचय दिया। अंत में उर्वशी ने रुष्ट होकर इनको एक वर्ष तक नपुंसक रहने का शाप दिया। महाभारत के युद्ध में रण-निमंत्रण के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन से कहा की एक ओर मेरी नारायणी सेना रहेगी तथा दूसरी ओर मैं नि:शस्त्र होकर स्वयं रहूंगा।

भले ही आप पहले आये हैं, किंतु मैंने अर्जुन को पहले देखा है। वैसे भी आप से आयु में ये छोटे हैं। अत: इन्हें मांगने का अवसर पहले मिलना चाहिए। भगवान के इस कथन पर अर्जुन ने कहा- ‘प्रभो! मैं तो केवल आपको चाहता हूं। आपको छोड़कर मुझे तीनों ही लोकों का राज्य भी नहीं चाहिए। आप शस्त्र लें या न लें, पाण्डवों के एकमात्र आश्रय तो आप ही हैं। अर्जुन की इसी भक्ति और निर्भरता ने भगवान श्रीकृष्ण को उनका सारथी बनने पर विवश कर दिया।

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