रावण ने स्वयं चुनी थी श्रीराम के हाथों मृत्यु जानें क्यों ?

2015_7image_11_08_336203039ram-5501-llजब जीव के स्वभाव में रजोगुण अथवा तमोगुण की अधिकता होती है, तो उनके सभी कर्म, कामना और आसक्ति से प्रेरित होते हैं। तमोगुण से उत्पन्न अज्ञान तो मनुष्य में कर्तव्य कर्मों के प्रति अप्रवृत्ति उत्पन्न करता है, अगर उपरोक्त गुण जीव के स्वभाव में आ जाएं तो लोभ, स्वार्थ बुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरंभ,अशांति, विषय भोगों की लालसा, अंत:करण में अप्रकाश, व्यर्थ चेष्टाएं जीव के स्वभाव में शामिल हो जाती हैं।

खर-दूषण के वध की सूचना जब रावण को प्राप्त हुई तो रावण अत्यंत चिंतित हो गया क्योंकि खर-दूषण उसके समान ही बलशाली थे। वह सोचने लगा कि उनका (खर-दूषण) वध श्री मन नारायण (श्रीराम) के अतिरिक्त कोई भी करने में सक्षम नहीं है। अगर नारायण स्वयं पृथ्वी का भार उतारने के लिए प्रकट हुए हैं तो मेरी इस तामसी  देह से भजन तो होगा नहीं और अगर वह भगवान से शत्रुतापूर्वक व्यवहार करके उनके हाथों मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तब ही उसकी मुक्ति निश्चित है। श्री भगवान की दिव्य मानव लीला से अवगत होते हुए भी रावण अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं ला सका और अपने तमोगुणी स्वभाव का परित्याग नहीं कर सका।
 
बड़ों के प्रति आदर भाव, ज्ञानी, संत का सम्मान, ईश्वर भक्ति, सत्य, दया और करूणा इत्यादि गुण जब तक जीव के स्वभाव में नहीं आते तथा इच्छा, भय और क्रोध का अभाव नहीं होता, तब तक श्रेष्ठ कर्मों का आचरण संभव नहीं है। अगर जीव इसके लिए निरंतर अभ्यास एवं प्रयत्न करे तो परोपकार करना उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाएगा और उसे परमशांति अनुभव होगी।
 
जब अर्जुन मोहवश अपने स्वाभाविक कर्म को भूल गया था तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि :
 
‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शांति स्थानं प्रास्यसि शाश्वतम्।’’
 
हे भारत-तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
 
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