जानिए कितना प्राचीन है जैन धर्म

जैन धर्म का उद्भव सनातन धर्म से ही हुआ है। जैन धर्म भारत के प्रचीन धर्मों में से एक है। जैन का अर्थ होता है ‘जिन द्वारा प्रवर्तित धर्म’। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं पहले तीर्थंकर ऋषभदेव इन्हें ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है और आखिरी तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं।

janism_28_01_2016जैन धर्म में श्रावक( अनुयायी) और मुनि दोनों के लिए पांच व्रत बताए गए हैं। तीर्थंकर आदि महापुरुष जिनका पालन करते है, वह महाव्रत कहलाते हैं। जैन धर्म के पांच व्रतों में क्रमशः अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह है। अंतर इतना है कि मुनि इन नियमों का सूक्ष्म रूप में पालन करते हैं और श्रावक स्थायी रूप से इन व्रत का पालन करते हैं।

जैन धर्म काफी प्रचीन धर्म है। इस बात की पुष्टि वैदिक ग्रंथ तो करते ही हैं साथ में सदियों से इतिहासकार भी जैन धर्म की प्राचीनता पर मुहर लगाते आए हैं।

भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाती राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के पृष्ठ क्रमांक 62 में उल्लेखित है, ‘मोहन जोदड़ों की खुदाई में योग के जो प्रमाण मिले हैं, वेजैन मार्ग के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के हैं। इस दृष्टि से जैन विद्वानों का यह मानना अयुक्तियुक्त नहीं दिखता कि ऋषभदेव वेदोल्लिखित होने से भी वेद-पूर्व हैं।’

इतिहासकार विसेन्ट ने मथुरा में जैन धर्म पर अध्ययन के समय लिखा था, ‘इन खोजों (मथुरा के स्तूप आदि से) से लिखित जैन परम्परा का बहुत सीमा तक समर्थन हुआ है और वे जैन धर्म की प्राचीनता के और प्राचीनकाल में भी बहुत ज्यादा वर्तमान स्वरूप में ही होने के स्पष्ट व अकाट्य प्रमाण हैं। ईस्वी सन्‌ के प्रारंभ में भी चौबीस तीर्थंकर अपने भिन्न-भिन्न चिह्नों सहित निश्चित तौर पर माने जाते थे।’

मार्डन रिले ऑफ ऑगस्त, 1932 बुक में पुरातात्विक श्री रामप्रसाद चंद्रा लिखते हैं, ‘मोहन जोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त मोहरों में जो मुद्रा अंकित है, वह मथुरा की ऋषभदेव की मूर्ति के समान है व मुद्रा के नीचे ऋषभदेव का सूचक बैल का चिह्न भी मिलता है।’

इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया, पृष्ठ-51 में उल्लेखित है, ‘यह भी निर्विवाद सिद्ध हो चुका है कि बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध के पहले भी जैनियों के 23 तीर्थंकर हो चुके हैं।’

सिंध फाइव थाऊजेंड इअर्स अगो, पेज-158-159 उल्लेखित है, ‘कर्जन म्यूजियम ऑफ आर्कियोलॉजी मथुरा में सुरक्षित एक प्रस्तर-पट्ट पर उत्कीर्णित चार मूर्तियों में से एक वृषभ जिन की खड़ी हुईमूर्ति कायोत्सर्ग मुद्रा में है। यह ईसा की द्वितीय शताब्दी की है। मिस्त्र के आरंभिक राजवंशों के समय की शिल्प-कृतियों में भी दोनों ओर हाथ लटकाए खड़ी कुछ मूर्तियाँ प्राप्त हैं। यद्यपि इन प्राचीन मिस्त्र मूर्तिया और यूनान की कुराई मूर्तियां की मुद्राएं भी वैसी ही हैं, तथापि वह देहोत्सर्गजनित निःसंगता जो सिन्धु घाटी की सीलों पर अंकित मूर्तियां तथा कायोत्सर्ग ध्यानमुद्रा में लीन जिन-बिम्बों में पाई जाती हैं, इनमेंअनुपस्थित है। वृषभ का अर्थ है बैल और बैल वृषभ या ऋषभ जिन की मूर्ति का पहचान चिह्न है।’

ठीक इसी तरह इतिहासकार कर्नल टाड अपनी बुक राजस्थान में लिखते हैं, ‘मुझे प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में चार बुद्धया मेधावी महापुरुष हुए हैं। इनमें पहले आदिनाथ या ऋषभदेव थे। दूसरे नेमिनाथ थे। ये नेमिनाथ ही स्केंडिनेविया निवासियों के प्रथम ओडिन तथा चीनियों के प्रथम फो नामक देवता थे।’

ऐसे और भी कई इतिहासविज्ञों द्वारा दिए गए प्रमाण हैं जिनसे यह साबित होता है। जैन धर्म भारत का बहुत प्रचीन धर्म हैं। जिसका उल्लेख मोहन जोदड़ो और हड़प्पा जैसे अति प्राचीन शहरों की मुहरों पर मिलता है।

 

 

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