जानिए क्या प्राचीनकाल के ये महान योद्धा आज भी हैं सक्रिय

इस धरती पर दो ही मार्ग है युद्ध (कृष्ण) या बुद्ध। बुद्ध का विचार भी बगैर युद्ध के स्थापित नहीं हो सकता। युद्ध एक ऐसा धर्म है जिसकी हर काल में जरूरत रही है। जिस कौम ने युद्ध करना छोड़ दिया उसका अस्तित्व भी धीरे-धीरे मिट ही गया है। अहिंसा नहीं युद्ध होता है परमो धरम। युद्ध में ही चेतना का विकास होता है। युद्ध के मार्ग पर चलकर ही अहिंसक हुआ जा सकता है। लादी गई या संस्कारजन्य अहिंसा कायरता है।जानिए क्या प्राचीनकाल के ये महान योद्धा आज भी हैं सक्रिय

महाभारत में तो एक से एक योद्धा था। जैसे द्रोण, कर्ण, अर्जुन, भीष्म, प्रद्युम्न, कृपाचार्य, बलराम आदि और मायावी में बर्बरिक, घटोत्कच आदि। रामायण काल में भी कई सुर और असुर योद्धा था। जैसे रावण, मेघनाद आदि और मायावी में कुंभकर्ण, मारिच आदि। लेकिन हमने ऐसे योद्धाओं को छाटा है जिनके कारण भारत का इतिहास ही बदल गया। हालांकि एक दो अपवाद छोड़ दें तो इनको पराजित करने का साहस कभी किसी में नहीं रहा।
 
हम आपको बताना चाहते हैं प्राचीन भारत के ऐसे ही महान शक्ति से संपन्न योद्धाओं के बारे में जिन्होंने अपनी शक्ति के बल पर समाज को बदल कर रख दिया। इनमें से कुछ धर्म के मार्ग पर चले तो कुछ ने अधर्म का साथ दिया। तो आओं जानते हैं उल्टे क्रम में ऐसे ही शक्तिशाली योद्धाओं के संबंध में।

इंद्र के पास कई तरह के अस्थ और शस्त्र थे, लेकिन उनमें से सबसे शक्तिशाली अस्त्र वज्र था। इन्द्र मेघ और बिजली के माध्यम से अपने शत्रुओं पर प्रहार करने की क्षमता रखते थे। वैदिक काल में युद्ध-विद्या अत्यंत विकसित थी। सैनिकगण घोड़े की सवारी करते थे और धनुष-बाण उन दिनों के सर्वाधिक प्रचलित अस्त्र थे। इन्द्र नाम से वेदों में कई युद्धों और कार्यों का वर्णन मिलता है। इन्द्र तत्कालीन आर्य सभ्यता की रक्षा करने वाला एक महत्वपूर्ण नेतृत्व था। शायद यही कारण है कि विजयादशमी के पावन पर्व पर भगवान राम के साथ ही हम इन्द्र का भी स्मरण करते हैं।
 
इंद्र के कार्य : इन्द्र ने कई युद्धों का संचालन किया। वृत्रासुर को मारने और दशराज्ञ के युद्ध में भरतों को जीताने के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इंद्र ने भगवान ब्रह्मा से आत्मज्ञान की शिक्षा लेकर खुद को शक्तिशाली और अजर अमर बना लिया था। इंद्र के साथ उस वक्त विरोचन ने भी शिक्षा ली थी। दोनों की शिक्षा का असर अलग अलग हुआ। इस संबंध में एक कथा प्रचलित है। कथा पढ़ने के लिए आगे क्लिक करें.. कैसे इंद्र और विरोचन के कारण दो तरह की विचारधारा अस्तित्व में आई…
 
ऋग्वेद के दसवें मंडल के सत्ताईसवें सूक्त में इन्द्र ने अपने बल तथा पराक्रम का स्वयं वर्णन किया है। उस सूक्त में उन्होंने कहा है कि वह केवल यज्ञकर्म-शून्य व्यक्तियों का ही विनाश करते हैं। कोई भी यह नहीं कह सकता कि उन्होंने कभी किसी सात्विक पुरुष का वध किया है।
 
स्वयं इन्द्र के ही शब्दों में- ”मेरी वीरता की सभी प्रशंसा करते हैं और ऋषिगणों तक ने मेरी स्तुति की है। युद्ध में कोई मुझे निरुद्ध नहीं कर सकता, पर्वतों में भी इतनी शक्ति नहीं कि वह मेरा रास्ता अवरुद्ध करने में सफल हो सकें। जब मैं शब्द करता हूं तो बहरे लोग भी कांपना शुरू कर देते हैं। जो लोग मुझे नहीं मानते और मेरे लिए अर्पित सोमरस का पान करने की घृष्ठता करते हैं उनको अपने वज्र से मैं मृत्यु के घाट उतार देता हूं।”

महान राजा बालि : राजा बलि (लगभग 9078 ईसा पूर्व)। असुरों के राजा बलि की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। दान-पुण्य करने में वह कभी पीछे नहीं रहता था। उसकी सबसे बड़ी खामी यह थी कि उसे अपनी शक्तियों पर घमंड था और वह खुद को ईश्वर के समकक्ष मानता था और वह देवताओं का घोर विरोधी था। भारतीय और हिन्दू इतिहास में राजा बलि की कहानी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बाद एक नए युग की शुरुआत हुई थी। हालांकि राजा बलि फिर भी महान और शक्तिमान है और आज भी वह महान और शक्तिमान बनकर घूम रहा है।
 
महाबली राजा बालि के 10 रहस्य, जानिए…
जब इंद्र ने बाली को मार दिया तब कैसे जिंदा होकर शक्तिशाली बना बालि?
 
दरअसल, वृत्र (प्रथम मेघ) के वंशज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद था और प्रहलाद का पुत्र विरोचन था और विरोचन का पुत्र बाली था। मोटे तौर पर वृत्र या मेघ ऋषि के वंशजों को मेघवंशी कहा जाता है। राजा बलि की सहायता से ही देवराज इन्द्र ने समुद्र मंथन किया था। समुद्र मंथन से प्राप्त जब अमृत पीकर देवता अमर हो गए, तब फिर से देवासुर संग्राम छिड़ा और इन्द्र द्वारा वज्राहत होने पर बलि की मृत्यु हो गई। ऐसे में तुरंत ही शुक्राचार्य के मंत्रबल से वह पुन: जीवित हो गया। लेकिन उसके हाथ से इन्द्रलोक का बहुत बड़ा क्षेत्र जाता रहा और फिर से देवताओं का साम्राज्य स्थापित हो गया। तब बाली ने ने देवताओं से बदला लेने के लिए घोर तपस्या और धरती का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। केरल में आज भी महाबली की याद में ओणम पर्व मनाया जाता है।

परशुराम : परशुराम ने महादेव से शिक्षा ली थी। वहीं से उन्हें शस्त्रों में परशु (फरसा) और अस्त्रों में दिव्य धनुष मिला था। लगभग सभी दिव्यास्त्र सिवाय प्रस्वापास्त्र और पाशुपतास्त्र के उनके वश में थे। इसके अलावा उनके पास श्रीहरि का दिया हुआ सुदर्शन चक्र भी था।

उन्होंने अत्याचारी हैहयवंशियों के विरुद्ध 21 बार युद्ध लड़ा था। उनके इस युद्ध में सभी लगभग सभी क्षत्रियों ने हैययवंशियों का साथ दिया था। लेकिन उन्होंने सभी को मौत के घाट उतार दिया था। लेकिन प्रभु श्रीराम के समक्ष समर्पण और भीष्म के समक्ष प्रस्वपास्त्र के कारण उन्हें झुकना पड़ा था। परशुराम अत्यंत कठोर प्रवृत्ति के थे। वे अपने शत्रुओं का समूश नाश करके ही दम लेते थे, लेकिन कहते हैं कि पराजितों के प्रति उनका व्यवहार भी अत्यन्त कठोर हुआ करता था। कहते हैं कि भगवान परशुराम आज भी जिंदा है।

वानरराज बाली  :  वानर राज बालि किष्किंधा का राजा और सुग्रीव का बड़ा भाई था। बालि का विवाह वानर वैद्यराज सुषेण की पुत्री तारा के साथ संपन्न हुआ था। तारा एक अप्सरा थी। बालि को तारा किस्मत से ही मिली थी। बालि के आगे रावण की एक नहीं चली थी, तब रावण ने क्या किया था यह अगले पन्ने पर पढ़ें।
 
बाली के बारे में जानिए संपूर्ण जानकारी..क्या था बालि की शक्ति का राज, जानिए
 
बालि के पिता का नाम वानरश्रेष्ठ ‘ऋक्ष’ था। बालि के धर्मपिता देवराज इन्द्र थे। बालि का एक पु‍त्र था जिसका नाम अंगद था। बालि गदा और मल्ल युद्ध में पारंगत था। उसमें उड़ने की शक्ति भी थी। धरती पर उसे सबसे शक्तिशाली माना जाता था, लेकिन उसमें साम्राज्य विस्तार की भावना नहीं थी। वह भगवान सूर्य का उपासक और धर्मपरायण था। हालांकि उसमें दूसरे कई दुर्गुण थे जिसके चलते उसको दुख झेलना पड़ा। 

बाद में उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रशिक्षण क्रमशः सांदीपनि और परशुराम से लिया था। परशुराम ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया था। उन्हें ज्ञात विश्व के समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था। उनके पास मुख्‍य अस्त्र और शस्त्रों में चक्र, धनुष, खड़ग और गदा थी। विश्व में शिव के अतिरिक्त व्यक्ति जिन्हें ‘वैष्णव ज्वर’ (Bio-weapons) का भी ज्ञान था। वे सभी कलाओं और विद्याओं में पूर्ण थे। इसीलिए उन्हें पूर्णावतार भी कहा जाता है।
 
वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी थे जैसा कि मद्र राजकुमारी लक्ष्मणा के स्वयंवर में प्रमाणित हुआ जहां अर्जुन भी फेल हो गए। उनका संपूर्ण जीव युद्ध युद्ध और सिर्फ युद्ध में ही व्यतीत हुआ। उन्होंने महादेव शिव तक को पराजित किया और अकेले ही इन्द्र सहित समस्त देव सेना को परास्त कर दिया था। जो उनके जीवन के को रासलीला की बात करते हैं उन्होंने कभी महाभारत पढ़ी ही नहीं और वे सभी श्रीकृष्ण के भक्त नहीं शत्रु हैं। श्रीकृष्ण जैसा योद्धा कभी इस धरती पर नहीं हुआ और न होगा।

श्रीरामरक्षा स्‍त्रोत से प्रसन्‍न होते हैं भगवान राम, करते हैं रक्षा
त्रिदेव ही विश्व के रचयिता, संचालक और पालक हैं

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