प्रजापति ने ऐसे दिया देव, असुर और मानव को प्रकृति का संदेश

हमारे शास्त्रों में प्रजापति को प्रथम पुरुष कहा गया है। ऋग्वेद में भी इस बात की पुष्टी की गई है। प्रजापति के तीन पुत्र थे – देव,असुर और मनुष्य। ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करते हुए एक दिन शिष्य भाव से देव प्रजापति से बोले- ‘भगवन हमें उपदेश दिजिए।’ प्रजापति ने केवल ‘द’ कहा और चुप हो गए। फिर पूछा ‘तुम क्या समझे?’ देव ने थोड़ी देर आत्मनिरीक्षण किया और बोले ‘समझ गए भगवन।’ आपने कहा दाम्पत अर्थात इन्द्रियों का दमन करना। इन्द्रियों के दमन से ही कोई महान बनता है।’

इसके बाद मनुष्य को भी इच्छा हुई कि वह कोई प्रश्न पूछे। एक दिन उसने भी कहा कि, ‘भगवान हमें भी उपदेश दिजिए।’ इस बार भी प्रजापति बोले ‘द’। मनुष्य ने भी देव की तरह आत्मनिरीक्षण किया और इस परिणाम पर पहुंचा कि प्रजापति की तात्पर्य ‘दत्त’ अर्थान दान करने से है।

अब असुर भी पीछे कैसे रहते। इसलिए जब असूरों की बारी आई तो उन्होंने भी प्रजापति से वही प्रश्न किया। उनको भी प्रजापति ने ‘द’ कहा। उन्होंने भी विचार किया और समझ लिया कि ‘द’ से तात्पर्य ‘दयध्वम’ अर्थात दया से है।

प्रजापति ने कहा कि ‘ठीक है आप तीनों ने मेरा अभिप्राय सही समझा। आत्मनिरीक्षण कर तुममें से जिसमें जिस गुण की कमी थी उसने वही ग्रहण कर लिया। मेरे द्वारा दिए गए ‘द’ संकेत का तुमने जो संदेश ग्रहण किया है, वैसा ही तुम चाहो तो प्रकृति से भी ग्रहण कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर विद्युत गरजती है। ‘द’ ‘द’ ‘द’ इससे भी तुम दमन, दान और दया की प्रेरणा ले सकते हो।’

प्रजापति के आदेश का तीनों ने अमल किया, लेकिन तीनों की दुनिया अलग-अलग बनी। देव और मनुष्य ने असुरों को निम्न समझा और स्वयं को श्रेष्ठ समझा।

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