सावन के महीने में जरूर जानिए केदारनाथ और भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कहानी

आप सभी इस बात से वाकिफ ही होंगे कि सावन का पवित्र महीना चल रहा है और इसमें अगर देवो के देव महादेव का पूजन किया जाए तो मन में जो हो पूरा हो जाता है. ऐसे में कहते हैं सावन के महीने में भोले की लिंग रुप में भी पूजा होती है और भगवान शिवलिंग रुप में 12 स्थानों पर विराजमान है. ऐसे में आज हम आपको दो लिंगों की कहा बताने जा रहे हैं, आइए जानते हैं.

*उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर- यह 12 ज्योतिर्लिंग में एक, चार धाम और पंच केदार में से भी एक है और केदारनाथ मंदिर 3593 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है. कहते हैं इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था. यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है. कथानुसार इस ज्योतिर्लिंग की मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे. भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले. वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे. भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे.

दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए.भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले. पांडवों को संदेह हो गया था. अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिया. अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए. भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा. तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया. भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए. उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया. उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं.

*भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग – आपको बता दें कि यह महाराष्ट्र के पूणे में सह्याद्रि नामक पर्वत पर है और भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से जानते है. इस ज्योतिर्लिंग की मान्यता है कि कुम्भकर्ण का बेटा भीम भगवान् ब्रह्मा के वरदान से अत्याधिक बलवान हो गया था. बल के मद में अंधा होकर उसने शिवभक्तों पर अत्याचार किया. इंद्र देव को भी उसने युद्ध में हरा दिया था. शिवभक्त राजा सुदाक्षण को उसने जेल में डाल दिया था. सुदाक्षण ने जेल में शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी इसकी जानकारी मिलते ही एक दिन भीम वहां आ गया और उसने शिवलिंग को अपने पैरों से रौंध डाला क्रोधित होकर भगवान् शिव वहां प्रगट हुए और राक्षसराज भीम का वध कर दिया. तभी से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर पड़ गया. ऐसी मान्यता भी है कि जो कोई इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं.

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