जानिए क्या है माँ नर्मदा की प्रेम कहानी, आखिर क्यों उन्होंने नहीं किया विवाह

माघ के महीने में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है। इस दिन सभी भक्त माँ नर्मदा नदी की पूजा करते हैं। कहा जाता है माँ नर्मदा सभी के जीवन में शांति और समृद्धि लाती है। ऐसे में आप सभी यह तो नहीं जानते होंगे कि माँ नर्मदा ने हमेशा कुँवारी रहने का प्रण लिया था। अब आज माँ नर्मदा की जयंती पर हम आपको बताने जा रहे हैं कि उन्होंने यह प्रण क्यों लिया था। इसके पीछे एक कथा है जो हम आपको बताने जा रहे हैं।
कथा- राजा मैखल की पुत्री नर्मदा को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। राजा मैखल ने नर्मदा के विवाह के लिए एक शर्त रखी कि जो राजकुमार गुलबकावली के फूल लेकर मेरी बेटी को देगा उससे इसका विवाह तय कर दिया जाएगा। नर्मदा से शादी करने का मौका सोनभ्रद नाम के एक राजकुमार को मिला जो की नर्मदा के लिए वो पुष्प लाया था। अब विवाह में कुछ ही समय शेष था और सोनभ्रद से पहले कभी न मिले होने के कारण राजकुमारी नर्मदा ने अपनी दासी जुहिला के हाथ राजकुमार को एक संदेश भेजा। राजकुमारी के वस्त्र और गहने पाकर जुहिला सोनभ्रद को मिलने चली गई। वहां पहुँचकर जुहिला ने राजकुमार को नहीं बताया कि वह दासी है, और उसे राजकुमारी समझ कर सोनभ्रद उस पर मोहित हो गया। काफी समय बीतने के पश्चात जब जुहिला लौट कर ना आई तो राजकुमारी नर्मदा स्वयं सोनभ्रद से मिलने को चली गई। परन्तु वहाँ जाकर उसने देखा कि जुहिला और सोनभ्रद एक दूसरे के साथ थे। यह दृश्य देख नर्मदा क्रोधित हो गई और घृणा से भर उठी। उसके बाद वह तुरंत वहां से विपरीत दिशा की ओर चल दी और कभी वापिस न आई। बाद में नर्मदा बंगाल सागर की बजाए अरब सागर में जाकर मिल गईं और उन्होंने कसम खाई कि वे कभी भी विवाह नहीं करेंगी हमेशा कुंवारी ही रहेंगी। कहते हैं आज तक भी सोनभ्रद को अपनी गलती पर पछतावा है लेकिन नर्मदा कभी लौटकर वापस नहीं आई। कहते हैं आज तक नर्मदा का विलाप और उनके दुःख की पीड़ा उनके जल की छल-छल की आवाज़ में सुनाई पड़ती है।
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