भक्तों की कोई जाति नहीं होती

2015_6image_14_49_590115669yogeshwar1-llश्रीइन्द्रद्युम्न स्वामी के लेखों से – अप्रैल, 1996 

बात उन दिनों की है जब मैं बोस्नीया के साराजेवो में युद्ध के बाद एक टूटे-फूटे हस्पताल में डा.  नाकास से मिला। कुछ मुस्लिम सैनिकों ने भक्तों की टोली पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया था। स्वस्थ भक्तों को मन्दिर में भेज कर मैं घायलों को देखने हस्पताल आया था। जब डा. नाकास को मेरे आने की सूचना मिली तो वे मुझे मिलने आए। 
 
उन्होंने कहा- आपके लोगों के ज़ख्म गहरे हैं किन्तु वे बच जाएंगे। मैं एक मुसलमान हूं किन्तु मुझे मेरे लोगों की इन हरकतों पर शर्म आती है। युद्ध तो समाप्त हो गया है किन्तु वे फिर भी विदेशियों पर हमला कर रहे हैं। कृपया मुझे क्षमा कर दें। 
 
अपना हाथ बढ़ाते हुए उन्होंने मेरा हाथ थामा और बड़े प्यार से कहा – हम सब भाई-भाई हैं।
 
मैं उनके प्यार भरे व्यवहार से अवाक था और मैंने कहा – आप का कोई दोष नहीं है, न ही मुस्लिम धर्म का। ये तो कुछ आवांछित तत्वों के कारण हो रहा है। फिर वे मरीज़ों को देखने चले गए।
 
इतने में वही सैनिक हस्पताल में आ गए। उन्होंने मुझे घेर लिया। इससे पहले की वो कुछ करते, डा. नाकास आ गए और उन्हें वहां से चले जाने के लिए ललकारा। सैनिक चुपचाप वहां से खिसक गए।
 
डा. का वहां बहुत सम्मान था। तीन साल तक निरन्तर उन्होंने सबकी देख-रेख की थी। उन्होँने पानी, बिजली, दवाईयां न मिलने के बावज़ूद भी जो हो सकता था, सबके लिए किया। युद्ध के आखरी दो साल तो जैसे वे सोये ही नहीं। मैं हैरान था कि उनमें यह शक्ति कहाँ से आ रही है।
 
वहां की स्थानीय भक्त जाह्नुकन्यक दीदी ने बताया कि युद्ध के दौरान बीच-बीच में हम हस्पताल जाते थे और कीर्तन करते व प्रसाद बांटते थे। हालांकि सैनिक जहां-तहां हमला करते रहते थे किन्तु भगवान के लिए हम यह जोखिम उठाते थे। 
 
डा. नाकास को न जाने कहां से श्रीमद् भगवद् गीता की एक प्रति मिली थी। वे सर्जरी के लिए जाने से पहले अपने साथियों को श्रीगीता सुनाते थे। गीता के श्लोक उनके अन्दर परिवर्तन ला रहे थे। चूंकि डा. नाकास गीता पढ़ रहे थे, उनकी देखा-देखी उनके साथियों ने भी गीता पढ़नी प्रारम्भ कर दी।  
 
युद्ध के उपरान्त डा. नाकास ने मन्दिर के लिए एक इमारत ढूंढने की पेशकश भी की थी। कुछ समय उपरान्त उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसके चलते वे कोमा में चले गए। स्थानीय भक्त श्रीमती जाह्नुकन्यक दीदी ने वहां के डाक्टरों से बातचीत करके I.C.U.  में जाने की आज्ञा ले ली। उन्होंने वहां जाकर गीत के नौंवें अध्याय का पाठ किया। यह अध्याय डा. नाकास को सबसे प्रिय था। हालांकि वहां उपस्थित सभी मुस्लिम थे किन्तु किसी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की।
 
कुछ दिन बाद उनको हस्पताल से फोन आया व पुनः आने के लिए कहा। तब उन भक्त ने वहां जाकर श्रीदामोदरष्टकम् व हरे कृष्ण महामन्त्र गाया। बाद में श्री गीता का सातवां अध्याय भी पढ़ा। किसी ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि वे जानते थे कि डा. नाकास इन परिस्थितियों में ऐसा ही चाहते थे।
 
दो दिन बाद वे चल बसे। लगभग 10000 लोगों ने उन्हें अन्तिम विदाई दी। वो सबके प्रिय थे।
 
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