कभी न भूलें ईश्वर की ये अनमोल सौगात

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धैर्य व्यक्तित्व में ईश्वर द्वारा प्रदत्त ऐसा अनुपम गुण है, जो मनुष्य को देवोपम बना देता है।यदि व्यक्ति में धीरज हो तो वह चाहे कैसी भी विपदा आ जाए, विचलित नहीं होता। 

धैर्य की बदौलत ही वह हर परिस्थति को बिना किसी उद्विग्नता के न केवल स्वीकार कर लेता है बल्कि मुकाबला करने को भी तत्पर रहता है। धीर-गंभीर पुरुष की यह विशेषता होती है कि वह निरर्थक को सार्थक में बगैर झुंझलाहट के तब्दील करने का हुनर जानता है। 
 
संत कबीर ने कहा है, धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होए।
 
जीवन के लिए सबक
यानी जल्दबाजी और उतावलेपन में कुछ नहीं रखा है। हे मन! धैर्य धरो। बीज बोने के बाद यदि माली सौ घड़े पानी से उसे सींच ले और तुरन्त प्रतिफल की कामना करें तो गलत होगा। 
 
फल तो पौधा बड़ा होने और ऋतु के आगमन पर ही देगा। कह सकते हैं कि मनुष्य के समग्र विकास के लिए धैर्य परमावश्यक है। महात्मा बुद्ध के धैर्यशाली और संयत व्यक्तित्व से जुड़ा एक प्रसंग याद आता हैं। बुद्ध से ईष्र्या रखने वाले एक दुष्ट व्यक्ति ने बुद्ध को खूब गालियां दीं। बहुत देर तक वह अपशब्द बोलता रहा। 
 
बुद्ध धैर्यपूर्वक चुपचाप सुनते रहे और उसे साक्षी भाव से देखते रहे। जब वह गालियां बकते-बकते थक गया तो बुद्ध बोले, भद्रे! तुम्हारे घर कोई मेहमान आए तो तुम भोजनादि से सत्कार करते हो। 
 
मान लो, अतिथि आपका भोजन स्वीकार न करे तो क्या होगा?Ó उसने जवाब दिया, भोजन हमारे घर में ही रह जाएगा। बुद्ध बोले कि अभी ऐसा ही हुआ है। 
 
तुमने जो अपशब्द बोले, वो मैंने यहीं छोड़ दिए हैं। कह सकते हैं कि ज्यों-ज्यों धैर्य धारण करने की क्षमता बढ़ती है, त्यों-त्यों उसके अंदर संयम और शालीनता का आविर्भाव होने लगता हैं। साथ ही, अन्य सद्गुणों से भी उसका व्यक्तित्व शोभायमान होने लगता है।
 
धैर्य में हैं सफलता के बीज
हमारे शास्त्रों में भी नायक का प्रमुख लक्षण धैर्य बताया गया हैं। उसे धीरोदात्त नायक की संज्ञा दी गई है। त्वरित फल प्राप्ति की कामना अविकसित व्यक्तित्व की निशानी है। 
 
जल्दी में काम करना और काम के परिणाम में जल्दबाजी दिखाना दोनों ही गलत है। इसीलिए तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कर्म पर ही तेरा अधिकार है, उसके फलों पर नहीं। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – जैसा संदेश देकर भगवान श्री कृष्ण धीरज धारण करने की प्रेरणा ही दे रहे हैं। 
 
वो नहीं चाहते कि मेरा भक्त या साधक कर्म के दौरान अधीर हो जाए और शीघ्र फल के चक्कर में भ्रमित होकर भटकाव का शिकार हो जाए। 
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