कैसे हुआ देवर्षि नारद का जन्म? यहां पढ़ें ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाने की कथा

वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर देवर्षि नारद जी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन नारद जयंती मनाई जाती है। क्या आप जानते हैं कि देवर्षि नारद (Devarshi Narada Birth Story) के जन्म का रहस्य जानते हैं? अगर नहीं पता, तो चलिए आपको बताते हैं देवर्षि नारद के जन्म से जुड़ी कथा के बारे में।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, नारद जी देवी-देवताओं और राजाओं को सूचनाओं का आदान प्रदान करते थे। इसी वजह से उन्हें ब्रह्मांड का सबसे पहला पत्रकार माना जाता है। नारद पुराण में नारद जी के जीवन के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है।

सनातन धर्म में देवर्षि नारद (Devarshi Narada Katha) को विशेष स्थान प्राप्त है। देवर्षि नारद ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एक हैं, लेकिन क्या जानते हैं कि ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाने की क्या वजह है। अगर नहीं पता है, तो ऐसे में आपको इस आर्टिकल में बताते हैं देवर्षि नारद के जन्म का रहस्य।

क्यों कहा जाता है नारद मुनि को ब्रह्मा का मानस पुत्र?

देवर्षि नारद के जन्म का वर्णन नारद पुराण,भागवत पुराण और विष्णु पुराण में देखने को मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, नारद मुनि को ब्रह्मा का मानस पुत्र इस वजह से कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म मन, संकल्प और तप से माना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मानस का अर्थ मन से उत्पन्न हुआ होता है। पुराणों में बताया गया है कि जब सृष्टि की रचना की शुरुआत में ब्रह्मा जी ने ध्यान किया। इस दौरान उन्होंने में भक्ति और धर्म का प्रचार करने का संकल्प लिया। ऐसा माना जाता है कि उसी संकल्प से नारद मुनि का अवतरण हुआ।

पौराणिक कथा के अनुसार, पिछले जन्म में नारद ‘उपबर्हण’ नाम के गंधर्व थे। एक समय ऐसा आया जब अप्सराएँ और गंधर्व गीत से ब्रह्मा जी की उपासना कर रहे थे। उस दौरान उपबर्हण रासलीला में लीन हो गए। इस दृश्य को देख ब्रह्मा जी को क्रोध आया। उन्होंने उपबर्हण को श्राप दे दिया कि तुम्हारा अगला जन्म शूद्र योनि में होगा।

इसके बाद उपबर्हण ने भक्ति की, जिससे उन्हें एक बार प्रभु के दर्शन हुए। ऐसे में प्रभु के प्रति उनकी आस्था और गहरी हो गई। इस दौरान आकाशवाणी हुई कि ‘हे बालक इस जन्म में तुमको मेरे दर्शन नहीं मिल पाएंगे।’ अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद होंगे। इसके बाद नारद मुनि में जगत के पालनहार विष्णु की कठिन तपस्या करने के फैसला लिया, जिसके बाद ब्रह्मा जी मानस पुत्र के रूप में अवतरित हुए।

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