सत्य घटना: भगवान में ही नहीं उनकी मूर्तियों में भी होते हैं प्राण

2015_8image_11_50_048845145cm-624x431-llएक बार भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी अपने भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु जी के साथ श्रील गौरी दास पंडित जी के घर, अबिंका-कालना (बंगाल) में उनसे मिलने गए।

श्रील गौरी दास पंडित जी ने आपकी बहुत सेवा की। जब भगवान वहां से चलने लगे, तो श्रील गौरी दास पंडित जी ने आपसे कुछ दिन वहीं रुकने के लिए प्रार्थना की।

भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी ने घर के पास ही नीमे के वृक्ष की लकड़ी से दो सुन्दर मूर्तियां  (श्रीविग्रह) बनाईं। एक मूर्ति श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की व एक श्रीनित्यानन्द प्रभुजी की। तब श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने श्रील गौरीदास पंडित जी से कहा कि आप इन विग्रहों की सेवा करना, इनमें और हममें कोई अन्तर नहीं है।

श्रील गौरी दास पंडित जी ने तब चार थालियों में भोजन परोसा और सभी के आगे रखा। भगवान की अचिन्तय शक्ति के प्रभाव से श्रीचैतन्य महाप्रभुजी, श्रीनित्यानन्द प्रभुजी एवं दोनों मूर्तियों ने साक्षात् भाव से भक्त के आगे भोजन किया। भोजन के बाद जब दोनों भाई चलने लगे, तो श्रील गौरीदास पंडित जी ने कहा की आप मत जाइए, अभी कुछ देर और रूकिए।

जैसे ही उन्होंने दोनों भाईयों (श्रीचैतन्य महाप्रभुजी व श्री नित्यानन्द प्रभुजी) को रोका, तो उनके श्रीविग्रह चलने लगे। श्रील गौरीदास पंडित जी यह देख कर हैरान रह गए। तब श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने उनसे कहा, ” अब या तो हम दोनों यहां रहेंगे या फिर ये दोनों (मूर्तियां) यहां रहेंगी। फैसला अपको करना है।”

श्रील गौरी दास पंडित जी ने जब यह कहा कि आप रूकिए तो वो दोनों मूर्तियां दरवाजे की ओर चलने लगीं। गौरीदास जी ने फटाफट जाकर उन्हें रोका तो श्रीचैतन्य महाप्रभु व श्री नित्यानन्द प्रभु जी दरवाज़े की ओर चल दिए। गौरी दास जी ने जब इन्हें रोका तो दोनों मूर्तियां चलने लगीं। 

जब ये ही चलता रहा तो श्रीमहाप्रभु जी ने पुनः उनसे कहा, “एक को चुनें। हम सक्षात् भाव से तथा मूर्ति (श्रीविग्रह) के रूप में हैं। इन दोनों जोड़ों (युगल) में से जिस जोड़े को आप ठहरने के लिए कहेंगे, वही रुकेंगे, दूसरा चला जाएगा।” 

इस पर श्रील गौरीदास पंडित जी ने विग्रह युगल (मूर्ति का जोड़ा) को जाने के लिए कहा और भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुजी को रहने के लिए कहा। 

श्रील गौरीदास पंडित जी की इच्छा को पूरा करने के लिए वो दोनों मूर्तियां (विग्रह-युगल) चले गए और श्री महाप्रभु- श्रीनित्यानन्द जी उनके मंदिर में चले गए।

 

 

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