मृत्यु से शुरू होती है परीक्षित जन्म की गाथा

sukdev1_08_11_2015पांडवों द्वारा अश्वमेध का समय निकट आ रहा था। धर्मराज युधिष्ठिर के अनुरोध पर श्रीकृष्ण-बलराम, सुभद्रा, प्रधुम्न और कृतवर्मा आदि हस्तिनापुर आए। हस्तिनापुर में उत्सव की शहनाई बजने लगी। महाभारत के अश्वमेधपर्व के अनुसार उत्तरा ( उत्तरा राजा विराट की पुत्री थीं।जब पाण्डव अज्ञातवास कर रहे थे, उस समय अर्जुन वृहन्नला रूप में अज्ञातवास काट रहे थे।

वृहन्नला ने उत्तरा को नृत्य, संगीत आदि की शिक्षा दी थी। जिस समय कौरवों ने राजा विराट की गाएं चुरा लीं। उस समय अर्जुन ने कौरवों से युद्ध करके अपूर्व पराक्रम दिखाया था और गाएं वापिस लाए। अर्जुन की उस वीरता से प्रभावित होकर राजा विराट ने अपनी कन्या उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अर्जुन ने यह कहकर कि उत्तरा उनकी शिष्या होने के कारण उनकी पुत्री के समान थीं। उस सम्बन्ध को अस्वीकार कर दिया था। कालान्तर में उत्तरा का विवाह अभिमन्यु के साथ सम्पन्न हुआ था।) को पुत्र पैदा हुआ।

आनंद शोक में बदलते देर नहीं हुई जब यह पता चला कि उत्तरा का पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ था। पांडवों का तर्पण करने वाला कोई नहीं था। सभी इसी बालक की तरफ उम्मीद लगाए हुए थे।

श्रीकृष्ण समझ गए कि अश्वत्थामा के ब्रह्मशिरा बाण के प्रभाव से यह बालक मृत पैदा हुआ था। कृष्ण ने उस बालक को गोद में लिया और उत्तरा और सुभद्रा से कहा, मैंने युद्ध में कभी भी पीठ नहीं दिखाई, कभी झूठ नहीं बोला, सत्य का साथ मैंने कभी नहीं छोड़ा। यदि शत्रु को जीतकर भी मैंने हिंसा नहीं की, तो यह शिशु जिंदा हो जाए। ऐसा कहने पर वह शिशु जीवित हो गया। इस बच्चे का नाम रखा गया परीक्षित।

 
 
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