‘विष्णु पुराण’ के रचियता का यह था सर्वश्रेष्ठ गुण

download (5)एक बार राजा त्रिशंकु ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के दौरान महर्षि विश्वामित्र और महर्षि वसिष्ठ के पुत्र शक्ति में विवाद हो गया। विवाद इतना बड़ गया कि विश्वामित्र ने शक्ति को शाप दे दिया। जिसके कारण शक्ति और उसके सभी भाईयों को दानवों ने मार दिया।

महर्षि वसिष्ठ ने यह सब कुछ देखा किंतु वो क्षमा की मूर्ति थे। लेकिन उनके परिवार में कोहराम मच गया। उनकी पत्नी अरुंधती और शक्ति की पत्नी शोक में डूब गईं। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें धीरज बंधाया। शक्ति की पत्नी ने बताया, ‘हमारा वंश भले ही नष्ट हो गया हो लेकिन मेरे गर्भ में एक बालक है।’

पौत्र के जन्म के बाद महर्षि वशिष्ठ ने उसका नाम पराशर रखा। बड़ा होने पर उसने अपनी मां से पूछा कि, ‘मेरे पिता कौन हैं?’ मां ने बेटे को सारा हाल कह सुनाया। यह सुनकर पराशर को क्रोध आ गया। उन्होंने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे कई शक्तियां प्राप्त की। फिर वह विश्व संहार की योजना बनाने लगे।

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लेकिन उनके दादाजी यानी पराशर ने रोकते हुए कहा, बेटा तुम्हारा क्रोधित होना स्वाभाविक है। कितु विश्व संहार की योजना बिल्कुल गलत है। तब पराशर ने विश्व संहार की योजना छोड़कर ‘राक्षस सत्र’ आरंभ कर दिया, जिसके कारण राक्षस अग्नि में गिरकर भस्म होने लगे। तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा, ‘इतना क्रोध मत करो। अपने कर्मों के अनुसार सभी का भला-बुरा होता है। सज्जनों का काम है क्षमा करना।’

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पितामह का उपदेश सुन पराशर ने राक्षस सत्र समाप्त कर दिया। उसी समय राक्षसों के कुलपुरुष महर्षि पुस्त्य ने प्रकट हुए और कहा, ‘पराशर क्षमा कर तुमने अपने प्रतिशोध को भुला दिया है। यह तुम्हारे कुल की मर्यादा के अनुरूप है और तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ गुण है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम शास्त्रों के ज्ञाता बनकर विष्णु पुराण की रचना करोगे।’

 

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