एक घटना ने महामूर्ख को बना दिया विद्वान, दुनिया करती है इन्हें सलाम

monk-1453361642-300x214यह एक सत्य घटना है, कल्पना नहीं। एक बालक हर बार परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाता। उसके सहपाठी उसे मंदबुद्धि कहते और हमेशा उसका मजाक बनाया जाता। उसकी खिल्ली उड़ाने के लिए लोग उसे बरधराज यानी बैलों के राजा के नाम से भी पुकारते। लगातार अपमान से दुखी होकर उसने निश्चय किया कि वह विद्यालय छोड़ देगा क्योंकि अध्ययन करना उसके बूते से बाहर की बात है।
 
यह इरादा कर वह विद्यालय से बाहर आ गया। वह ऐसी जगह जाना चाहता था जहां उसे कोई पहचानता न हो। चलते-चलते वह एक कुएं के पास पहुंच गया। वह वहां बैठ गया। महिलाएं कुएं से पानी खींच रही थीं। पानी खींचने के लिए वे एक रस्सी का उपयोग करतीं और जब वह रस्सी कुएं में आती-जाती, तब उसकी रगड़ से वहां मौजूद एक चट्टान पर निशान पड़ गए।
  
उसने गौर से देखा, जहां पानी से भरे मटके रखे जाते, उस चट्टान पर भी निशान हो गए थे। अचानक उसने सोचा, जब रस्सी और मटके जैसी साधारण वस्तुएं भी निरंतरता से कठोर चट्टान पर अपनी छाप छोड़ सकती हैं तो मैं क्यों इतना मजबूर हूं! मैं तो मनुष्य हूं। मैं भी अध्ययन में मिल रही असफलता को दूर कर सकता हूं। मैं भी अपनी छाप छोड़ सकता हूं।
 
उसने आगे जाने का निर्णय त्याग दिया। वह पुन: विद्यालय लौट आया और मन लगाकर अध्ययन करने लगा। उसने अभ्यास करना नहीं छोड़ा और निरंतर अभ्यास करता रहा। वही बालक एक दिन संस्कृत का महान विद्वान बना। उसने लघुसिद्धांत कौमुदी नामक ग्रंथ की रचना की जिसके बिना संस्कृत व्याकरण अधूरा है। बरधराज को लोग वरदराज कहने लगे और उसकी चर्चा बड़े विद्वानों में होने लगी। 
 
 

 
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