मंदोदरी ने हनुमान जी को बताया ऐसा राज जो ले गया रावण को मृत्यु के द्वार

वर्तमान समय कितना अद्भुत होता जा रहा है। लोग छोटी-छोटी बात को लेकर झगड़ा करने लगे हैं और आजकल तो अखबारों में एक नया कारनामा छप रहा है जिसे लोग ‘रोड रेज’ (Road Rage) के नाम से पुकारते हैं।

क्या अद्भुत कारनामा है की किसी की कार आप की कार से छू कर निकल गई और आपका पारा सातवें आसमान पर किसी की कार आपकी कार से आगे निकल गई तो आप गुस्से में लाल-पीले हो जाते हैं और झगड़े का प्रारम्भ हो जाता है। हम यह भी भूल जाते हैं कि घर में हमारे माता-पिता अथवा पत्नी-बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ अनहोनी हो गई तो उनका क्या होगा? उनकी उम्मीदों का क्या होगा?

प्रतिस्पर्धा अच्छी है परंतु ऐसी भी क्या जो किसी की जान ही ले ले। गुस्सा आना स्वभाविक ही है परंतु ऐसा भी क्या कि उसका फल परिवार भोगे? प्रतिस्पर्धा तो भक्तों में भी होती है किंतु एक स्वस्थ रूप में। भक्त का उद्देश्य भगवान की सेवा तथा उनको प्रसन्न करना होता है। भगवान की सेवा करते-करते, धीरे-धीरे उसका चित्त ऐसा निर्मल हो जाता है कि औरों को उत्साह देना उसका स्वभाव बन जाता है। ईर्ष्या तो दूर-दूर तक नहीं दिखती। शायद यही कारण है कि हमारे बड़े हमसे कहते थे कि बेटा सब कुछ करो लेकिन भगवान का भजन भी करो क्योंकि वे जानते थे कि इससे हमारा चित्त निर्मल हो जाएगा और कम से कम हम किसी से झगड़ेंगे नहीं और हमारे अंदर दूसरों को मान देने की भावना आएगी व किसी की तरक्की से हम जलेंगे नहीं। 

जगत जानता है कि विभीषण जी ने भगवान श्री रामचन्द्र जी को बताया कि रावण की नाभी में बाण मारने से वो मरेगा। भगवान तो अंतर्यामी हैं तो क्या वे नहीं जानते थे कि रावण की नाभी में बाण से प्रहार करने से वो मर जाएगा? वे जानते थे किंतु भक्त वत्सल भगवान भक्त का मान बढ़ाने के लिए अपने मान का तिरस्कार कर देते हैं। भगवान के भक्त उनसे भी बढ़ कर होते हैं व अपने सह-भक्त का मान बढ़ाने की भरपूर चेष्टा करते रहते हैं, वो भी बिना किसी लोभ के बिना किसी ईर्ष्या के। यह भजन का मार्ग है ही ऐसा। इसमें व्यक्ति अपना-पराया कुछ नहीं देखता क्योंकि साधु की नजर में सभी प्राणी उसके प्रभु के हैं, अतः सभी प्राणी उसके अपने ही हैंं।

रावण को मारने की युक्ति विभीषण ने दी राम भक्त हनुमान जी ने राम भक्त विभीषण को इसका श्रेय लेने दिया, जबकि रावण के वध के मूल में हैं श्री हनुमान। रावण, कुंभकरण व विभीषण ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की थी। जब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए तो सबने अपना-अपना वरदान मांगा। रावण ने मांगा कि वो अमर हो जाए। 

ब्रह्मा जी ने कहा,”अमरता देना उनके बस की बात नहीं।”

रावण के पुनः अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने रावण को एक बाण देते हुए कहा कि यह बाण लो और मैं इतना कर सकता हूं कि जब तक यह बाण तुम्हारी नाभी में नहीं लगेगा तब तक तुम्हारा अंत नहीं होगा। रावण ने वो बाण लिया और अपने राजमहल के अंदर अपने राज-सिंहासन के ठीक सामने वाले खम्बे के अन्दर चिनवा दिया।

युद्ध में भगवान श्री रामचन्द्र जब अपने बाण से रावण का सिर उसके शरीर से अलग कर देते हैं तब रावण का मस्तक जमीन पर गिर जाता है किंतु कुछ ही पल में पुनः अपने स्थान से जुड़ जाता है। बहुत बार जब ऐसा हुआ तब विभीषण ने रावण के न मरने का कारण बताया। सब कुछ सुनकर हनुमान जी ने कहा कि आप चिंता न करें व यह बताएं कि बाण कहां पर है। विभीषण जी ने कहा की यह तो मुझे मालूम नहीं पर यह भेद रावण या उसकी पत्नी मंदोदरी ही जानते हैं कि वह बाण कहां पर है।

बस फिर क्या था भगवान से आज्ञा लेकर हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और महान ज्योतिषाचार्य के रूप में लंका के प्रसिद्ध स्थानों पर भ्रमण करने लगे। ज्योतिषाचार्य के रूप में हनुमान जी जहां पर भी जाते व्यतिरेक भाव से लंका वासियों का भविष्य बताते तथा साथ ही साथ हरेक को रावण की महिमा सुनाते।

कई दिनों के बाद मंदोदरी के कानों में भी यह समाचार पहुंचा कि कोई ब्राह्मण रावण के बार में अद्भुत बातें बता रहा है। मन्दोदरी को भी उत्सुकता हुई और उसने उस ब्राह्मण को बुलवाया। ब्राह्मण ने आते ही रावण के बारे में अद्भुत बातें बताईं जो मन्दोदरी को भी नहीं पता थीं। बातों ही बातों में रावण की तपस्या और ब्रह्मा जी के वरदान की बातें भी बताईं व कुछ इस ढंग से बोलने लगे कि जैसे वो बाण सुरक्षित नहीं है। मन्दोदरी उनकी बातों में आ गई और उन्हें निश्चित करती हुई बोली कि वह बाण सुरक्षित है।

ब्राह्मण ने कहा कि यह तो मैं भी जानता हूं कि बाण हर तरह से सुरक्षित है और उसके बारे में केवल रावण और आप ही जानते हो पर मुझे डर यह है कि आप अपने स्त्री समाज में किसी को अथवा उन वनवासियों के किसी गुप्तचर को वो बाण न दिखा दें। हनुमान जी की वाकपटुता से प्रभावित होकर मंदोदरी के मुख से निकल गया कि हे ब्राह्मणदेव! आप बिलकुल निश्चिंत रहें कि कोई गुप्तचर उस बाण का पता लगा सकता है या देख सकता है क्योंकि वह बाण रावण ने बड़े ही सुरक्षित ढंग से राज-महल में अपने सिंहासन के सामने के खम्बे में चिनवा रखा है।

यह सुनते ही हनुमान जी असली स्वरूप में आ गए व ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ एक घूंसे से उन्होंने वह खम्बा तोड़ कर उसमें से बाण निकाल लिया और प्रभु श्री रामचन्द्र जी को लाकर दे दिया और उसी से रावण का वध हुआ।

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रावण वध के बाद क्यों किया पश्चाताप भगवान राम ने?

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