श्री राम ने गर्भावस्था में माता सीता को अयोध्या से किया निष्काषित

कहा जाता है की लंका से वापस आने पर अयोध्या में ये बात उठी थी कि राजा को एक पराये मर्द के घर रहकर आई स्त्री को अपने घर नहीं रखना चाहिए.ये बात कहने वाले को श्री राम दंड भी दे सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि ऐसा करना प्रजा के अधिकारों का हनन करना होता जो कि वो कदापि नहीं कर सकते थे. एक पति होने के नाते वो सीता जी को महल में ही रख सकते थे पर वो सिर्फ एक पति ही नहीं एक आदर्श राजा भी थे और ये बात सीता जी भी जानती थी इसीलिए श्री राम से उन्होंने स्वयं कहा कि वो अपना फैसला एक पति कि हैसियत से नहीं बल्कि एक राजा कि हैसियत से दें.और इसके बाद श्री राम ने सीता जी को अयोध्या से निष्काषित कर दिया था. सवाल किया जाता है कि श्री राम ने गर्भवती सीता को यूँ ही छोड़ दिया था उनके पास कोई सुरक्षा नहीं थी.श्री राम उन्हें उनके पिता के घर भी भेज सकते थे. 

एक बार सीता जी ने श्री राम से एक बार गर्भावस्था के समय गंगा किनारे आश्रमों के दर्शन करने की इच्छा जाहिर की थी.और वनवास पर भेजते समय उन्होंने उनकी इसी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हुए लक्ष्मण जी से सीता जी को गंगा किनारे भेजा था जहाँ पर वो जानते थे कि कई ऋषियों( वाल्मीकि भी ) के आश्रम है और उनमे से किसी न किसी में उन्हें शरण मिल जाएगी और उनकी देखभाल भी हो जाएगी. और धरा की उस पुत्री को उसी धरा पर कही आसरा न मिले ऐसा तो संभव नहीं था. सवाल किया जाता है कि जब सीता जी जंगलों में रह रही थी तब श्री राम महल में सुख-सुविधाओं से रह रहे थे.परन्तु ये सच नहीं है भौतिक सुविधाएं कई बार उतनी कीमत नहीं रखती जितनी कि समाज की बाकी चीजें रखती हैं.जैसे कि सीता जी जंगल में साधुओं के बीच सात्विक वातावरण में रह रही थी और उसके विपरीत श्री राम अयोध्या में उन लोगों के बीच रह रहे थे जिनकी वजह से श्री राम ने एक व्यक्ति के तौर पर अपनी भार्या खोयी थी.

अब बात आती है की वियोग किसने ज्यादा झेला.राम और सीता में कौन किससे ज्यादा प्रेम करता था इस बात का जवाब तो शायद उन दोनों के पास भी नहीं होगा.जितना वियोग राम को सीता से बिछड़ने का था उतना ही वियोग सीता को राम से बिछड़ने का था.पर कहते है कि एक परिवार माँ-बाप-बच्चों से बनता था.जहाँ श्री राम महल में अकेले थे वहीँ सीता जी के पास उनके दोनों बच्चे थे जो कि राम से बड़ा परिवार था.उस पर भी सीता जी को उनके बच्चो का प्रेम प्राप्त था परन्तु श्री राम को अपने ही बच्चों की नाराजगी का पात्र बनाना पड़ा था जो कि तब दूर हुआ था ,जब स्वयं श्री राम ने लव-कुश से कहा था कि वो फैसला एक राजा का फैसला था और राज-धरम के लिए अगर व्यक्ति को अपनी जान भी देनी पड़े तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए तभी वो राजा कहलाने के लायक होगा.

इसके बाद लव-कुश ने उनसे क्षमा भी मांग ली थी और कहा था कि ये गलती उनकी नहीं ये अयोध्या कि गलती थी.जो मेरे ख्याल से सही भी था क्योंकि जब राजा की जीत होती है तो उसे राज्य कि जीत कहा जाता है और जब हार होती है तो उसे राज्य की हार मानना चाहिए. श्री रामचन्द्र ने एक भगवान का नहीं एक इंसान का ही जीवन व्यतीत किया था और राजधरम को व्यक्तिगत धर्म से ऊपर रखा इसीलिए उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम कहा जाता है. सीता जी के वनवास का एक पहलु ये भी है कि पुराणो के अनुसार श्री राम भगवन विष्णु का अवतार थे और ऋषि अगत्स्य ने एक बार विष्णु जी को श्राप दिया था की उन्हें अपने जीवन का लम्बा समय अपनी अर्धांगिनी के बिना बिताना पड़ेगा शायद विधि का विधान भी सीता जी के वनवास का एक कारन हो सकता है.

इस सम्बन्ध में एक वाक्या और भी कहा जा सकता है कि एक बार हनुमान जी ने नारद जी के भगवन राम के नाम कि महानता को साबित करने के लिए उकसाने पर विश्वामित्र का सम्मान नहीं किया था.जिसपर उन्होंने श्री राम से उन्हें दण्डित करने को कहा था.हनुमान के अपने प्रिय होने के बावजूद श्री राम ने उन्हें दण्डित करने के लिए उन पर तीर चलाये पर हनुमान के श्री राम का नाम जपने के कारण वो उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाए. ये था श्री राम कि निष्पक्ष न्याय और ये थी श्री राम के नाम कि महिमा.

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