महाभारत का रहस्य: जब कई ज्ञानी मौजूद थे, तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ही गीता का ज्ञान क्यों दिया?

अर्जुन कर्मयोग का प्रतीक था। वह युद्ध से भागना नहीं चाहता था, बल्कि सही तरीके से युद्ध करना चाहता था। श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान उसी को दिया, जो प्रश्न करने का साहस रखता था। चलिए जानते हैं आखिर इसका अध्यात्मिक कारण क्या था कि अर्जुन को ही गीता का ज्ञान दिया गया।

महाभारत के युद्ध से पहले कुरुक्षेत्र में एक ऐसा क्षण आया, जिसने न सिर्फ युद्ध की दिशा बदली बल्कि पूरी मानवता को जीवन का मार्ग दिखा दिया। सवाल आज भी लोगों के मन में उठता है, जब पांडवों की ओर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य जैसे महान ज्ञानी मौजूद थे, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ही गीता का उपदेश क्यों दिया?

असल में अर्जुन उस समय सिर्फ एक योद्धा नहीं था, बल्कि एक असहाय मन का प्रतीक था। युद्धभूमि में खड़े होकर अर्जुन ने अपने ही लोगों को सामने देखा- गुरु, पितामह, भाई, मित्र। उसका धनुष गिर गया, शरीर कांपने लगा और मन में प्रश्न उठने लगे। यही वह स्थिति थी जिसे गीता में विषाद योग कहा गया।

गीता का ज्ञान उपदेश नहीं- संवाद
श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान उसी को दिया, जो प्रश्न करने का साहस रखता था। अर्जुन जानना चाहता था कि धर्म क्या है, कर्म क्या है और सही रास्ता कौन सा है। गीता का ज्ञान उपदेश नहीं, संवाद है, और संवाद वहीं संभव होता है जहां जिज्ञासा हो।

भीष्म और द्रोण जैसे ज्ञानी अपने-अपने संकल्पों और प्रतिज्ञाओं से बंधे थे। वे जानते हुए भी परिस्थिति बदल नहीं पा रहे थे। वहीं अर्जुन खुला हुआ मन लेकर खड़ा था- न अहंकार, न ज्ञान का दंभ। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने उसे गीता का पात्र चुना।

यह भी है गहरा रहस्य
एक और गहरा रहस्य यह भी है कि अर्जुन कर्मयोग का प्रतीक था। वह युद्ध से भागना नहीं चाहता था, बल्कि सही तरीके से युद्ध करना चाहता था। श्रीकृष्ण ने उसे सिखाया कि कर्म करो, फल की चिंता छोड़ दो- यही गीता का सार है। इसलिए गीता अर्जुन को दी गई, क्योंकि वह हर उस इंसान का प्रतिनिधि था जो जीवन में कभी न कभी द्वंद्व, भय और भ्रम से गुजरता है। महाभारत का यह रहस्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि अर्जुन हम सब के भीतर मौजूद है।

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