कुंभ में कमाएं पुण्य

कुम्भ का संस्कृत अर्थ है कलश। ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिन्ह है। ज्योतिषियों के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। ह्म्दिू धर्म में कुम्भ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है। हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं। लेकिन प्रयाग का कुंभ सबसे उत्कृष्ट भव्य होता है। गंगा यमुना की रेती सनातन मतावलंबियों से पहली बार कब गुलजार हुई, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है, लेकिन त्रेता युग में भी कल्पवास जैसी परंपरा थी। मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्घ तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें आठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में कुम्भ का वर्णन है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने इस बात का प्रमाण इस चौपाई से दिया है :- ‘माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सबक कोई। देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं, सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी॥’ अर्थात माघ माह में मकर राशि पर भगवान सूर्य आ जाते हैं और तीर्थों के राजा प्रयाग के संगमत तट पर कल्पवास शुरू हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ संस्था यूनेस्को ने भी कुंभ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया है। उसने माना कि कुंभ मेले से जुड़ा ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है। इसके कारण मेले के आयोजन की निरंतरता भी सुनिश्चित होती है। कुंभ आयोजन की कहानी देवासुर संग्राम और समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से जुड़ी है। मान्यता है कि देवताओं व असुरों के बीच समुद्र मंथन से निकले अमृत घट को प्राप्त करने के लिए देवों व असुरों में खींचतान हुई। इससे अमृत की बूंदे प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में गिरी। अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे। इसी कारण इन ग्रहों का विशेष महत्त्व रहता है और इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ का पर्व मनाने की परम्परा चली आ रही है। यही कारण है कि कुम्भ पर्व विश्व में किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन का संग्रöा है। लाखों-करोड़ों की संख्या में लोग इस पावन पर्व में उपस्थित होते हैं। हर कोई संगम में डुबकी लगाकर हर पाप, हर कष्ट से मुक्त होना चाहता है। श्रद्घालु इस पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्घि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से कुंभ के काल मे ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है। समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुम्भ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्ग लोक तक ले जाने में इंद्र के पुत्र जयंत को 12 दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के 1 वर्ष के बराबर है इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुम्भ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है। कुम्भ पर्व एवं गंगा नदी आपस में सम्बंधित हैं। यहां स्नान करना मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है। हर 144 वर्ष बाद यहां महाकुंभ का आयोजन होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुन: कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है। प्रयागराज का उल्लेख भारत के धार्मिक ग्रन्थों वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में भी मिलता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहां संगम होता है, इसलिए ह्म्दिुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है।

शाही और पवित्र स्नान
मकर संक्राति से प्रारम्भ होकर महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस महाकुम्भ में वैसे तो हर दिन पवित्र स्नान है फिर भी कुछ दिवसों पर खास स्नान होते हैं। इसके अलावा तीन शाही स्नान मकर संक्रांति 15 जनवरी, मौनी अमावस्या 4 फरवरी, वसंत पंचमी 10 फरवरी महत्वपूर्ण है। पौष पूर्णिमा 21 जनवरी, पौष एकादशी 31 जनवरी, माघी एकादशी 16 फरवरी, माघी पूर्णिमा 19 फरवरी व महाशिवरात्रि 4 मार्च को भी प्रमुख स्नान होंगे। ऐसे मौकों पर साधु संतों की गतिविधियां तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र होती है। कुम्भ के मौके पर तेरह अखाड़ों के साधु-संत कुम्भ स्थल पर एकत्र होते हैं। प्रमुख कुम्भ स्नान के दिन अखाड़ों के साधु एक शानदार शोभायात्रा के रुप में शाही स्नान के लिए निकलती हैं। भव्य जुलूस में अखाड़ों के प्रमुख महंतों की सवारी सजे धजे हाथी, पालकी या भव्य रथ पर निकलती हैं। उनके आगे पीछे सुसज्जित ऊँट, घोड़े, हाथी और बैंड़ भी होते हैं। संगम की रेती पर निकलती इस यात्रा को देखने के लिए लोगों के हुजूम इक हो जाते हैं। ऐसे में इन साधुओं की जीवन शैली सबके मन में कौतूहल जगाती है विशेषकर नागा साधुओं की, जो कोई वस्त्र धारण नहीं करते तथा अपने शरीर पर राख लगाकर रहते हैं। मार्ग पर खड़े भक्तगण साधुओं पर फूलों की वर्षा करते हैं तथा पैसे आदि चढ़ाते हैं। यह यात्रा विभिन्न अखाड़ा परिसरों से प्रारम्भ होती है। विभिन्न अखाड़ों के लिए शाही स्नान का क्रम निश्चित होता है। उसी क्रम में यह संगम में स्नान करते हैं।
कुंभ में स्नान करने के लाभ
– कुंभ में स्नान से मिलता है पुण्य।
– मनुष्य के पापों का प्रायश्चित होता है।
– इंसान की जीवन में बाधाओं का अंत होता है।
– कुंडली के दोष खत्म हो जाते हैं।
– वृष, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि वालों को विशेष लाभ होता है।
– विष्णु पुराण में कुंभ के महानता में लिखा गया है कि कार्तिक मास के हजारों स्नानों का, माघ के सौ स्नानों का अथवा वैशाख मास में एक करोड़ नर्मदा स्नानों का जो फल प्राप्त होता है, वही फल कुंभ पर्व के एक स्नान से मिलता है।
इसी प्रकार हजारों अश्वमेघ यज्ञों का फल या सौ वाजपेय यज्ञों का फल और पूरी धरती की एक लाख परिक्रमाएं करने का जो फल मिलता है, वही फल कुंभ के केवल एक स्नान का होता है।
– अथर्ववेद के अनुसार – महाकुम्भ बारह वर्ष के बाद आता है, जिसे हम कई बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जब आकाश में ग्रह-राशियों का अद्भुत योग देखने को मिलता है।
– यजुर्वेद में बताया गया है कि कुंभ मनुष्य को इस लोक में शारीरिक सुख देने वाला और हर जन्म में उत्तम सुखों को देने वाला है।
– अथर्ववेद में ब्रह्मा ने कहा है कि हे मनुष्यों! मैं तुम्हें सांसारिक सुखों को देने वाले चार कुंभ पर्वों का निर्माण कर चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में प्रदान करता हूं।

कल्पवास
मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन व्रत है, जो तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। इस दिन प्रयाग में पावन त्रिवेणी तट सहित हरिद्वार, नासिक, त्रयंबकेवर, गंगा सागर में लाखों-करोड़ों आस्थावान डूबकी लगाते हैं। इसके साथ ही शुरु हो जाता है धैर्य, अहिंसा व भक्ति का प्रतीक कल्पवास। पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा एवं मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक लाखों श्रद्घालु प्रभु दर्शन का भाव लिए ‘मोक्ष की आस में भजन-पूजन के जरिए 33 कोटि देवी-देवताओं को साधने के लिए कल्पवास करते है। कल्पवास का अर्थ कायाशोधन अथवा कायाकल्प है। सुख-सुविधा से परे, घर-परिवार व नाते-रिश्तेदारों दूर हजारों गृहस्थ गंगा की रेती पर धूनी रमा कर तप करते हैं। संतों के सानिध्य में आध्यात्मिक ऊर्जा हासिल होती है। हर कल्पवासी अपने तीर्थपुरोहित से संकल्प लेकर तप आरंभ करते हैं। सुख हो या दु:ख, कल्पवास बीच में छोड़कर घर, परिवार या रिश्तेदार के यहां जाने की अनुमति नहीं होती।

नियम का पालन न करने पर कल्पवास खंडित हो जाता है। कल्पवासी को 21 नियमों का पालन करना होता है। इसमें सत्य बोलना, दुसरों की निंदा न करना, हिंसा व क्रोध न करना, दया-दान करना, नशा न करना, सूर्योदय से पूर्व उठना, हरिकथा का वाचन एवं श्रवण, भूमि पर शयन, घर-गृहस्थी की चिंता न करना, ब्रह्मचर्य का पालन आदि शामिल है। अनुष्ठान, खाली समय में धार्मिक ग्रंथों एवं पुस्तकों का पाठ कल्पवासी के कर्म होते हैं। माया मोह से मुक्त माहभर कल्पवास के दौरान यहां जप-तप और यज्ञ-अनुष्ठान करने से मानसिक और आध्यात्मिक संतुष्टि के साथ ही शत्रुओं पर विजय का फल मिलता है। ‘अर्थ न धर्म न काम रुचि, गति न चहुं निर्वाण। जन्म-जन्म सियराम जी पद, यह वरदान दे आज अर्थात धर्म व पुण्य के लिए हमेशा भगवान के साथ मन लगा रहे इसलिए कल्पवास के समय एक माह तक यह वरदान मांगा जाता है।

प्रतिदिन शांति व सुकून के साथ भगवान का स्मरण करना अद्भुत लगता है। शायद यही वजह है कि कुंभ देश ही नहीं सात समुंदर पार विदेशियों के भी आस्था का केन्द्र रहा है। साधु-संतों की मौजूद्गी व उनके प्रवचन उन्हें यहां बरबस ही खींच लाते हैं। यहां बड़े-बड़े साधु व महात्माओं का प्रवचन सुनने को मिलता है। जहां पर धर्म की एक अलग ही दुनिया बसती है। इसी वजह से अनादि काल से प्रयाग ऋषियों व महात्माओं की तपोस्थली रही है। गंगा को स्वर्ग की नदी माना जाता है। यह पृथ्वी पर भगीरथ के तप से आयी और सागर के पुत्रों का उद्घार करते हुए सागर में मिल गयी। जिस दिन गंगा सागर में मिली थी वह मकर संक्रान्ति का दिन था। इसलिए मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान का पुण्य कई गुणा बताया गया है। मान्यता यह भी है कि मकर संक्रांति को ही स्वर्ग से गंगा की अमृत धारा धरती पर उतरी थी। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं और इस तिथि को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, अत: यह भी कहा जाता है कि सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं।

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