अमूर्त तक पहुँचने का सेतु है मूर्ति-पूजा

मूर्ति बहुत विकसित लोगों ने पैदा की थी। यह समझ लेना जरूरी है कि मूर्ति का जो संबंध है, वह है ब्रह्मांडीय शक्ति से। हमारे चारों तरफ जो ब्रह्म शक्ति है, उससे संबंधित होने का सेतु है वह। जिन लोगों ने भी मूर्ति विकसित की होगी, उन लोगों ने जीवन के परम रहस्य के प्रति सेतु बनाया था। यह परम रहस्य ही परमात्मा से हमारा संबंध जोड़ने वाला पुल है।

मूर्ति-पूजा का सारा आधार इस बात पर है कि आपके मस्तिष्क में और विराट परमात्मा के मस्तिष्क में संबंध है। दोनों के संबंध को जोड़ने वाला बीच में एक सेतु चाहिए। संबंधित हैं आप, सिर्फ एक सेतु चाहिए। वह सेतु निर्मित हो सकता है, उसके निर्माण का प्रयोग ही मूर्ति है। और निश्चित ही वह सेतु मूर्त ही होगा, क्योंकि आप अमूर्त से सीधा कोई संबंध स्थापित न कर पाएंगे। आपको अमूर्त का तो कोई पता ही नहीं है। चाहे कोई कितनी ही बात करता हो निराकार परमात्मा की, अमूर्त परमात्मा की, वह बात ही रह जाती है, आपको कुछ ख्याल में नहीं आता।

असल में आपके मस्तिष्क के पास जितने अनुभव हैं, वे सभी मूर्त के अनुभव हैं, आकार के अनुभव हैं। निराकार का आपको एक भी अनुभव नहीं है। जिसका कोई भी अनुभव नहीं है, उस संबंध में कोई भी शब्द आपको कोई स्मरण न दिला पाएगा। और निराकार की बात आप करते रहेंगे और आकार में जीते रहेंगे। अगर उस निराकार से भी कोई संबंध स्थापित करना हो, तो कोई ऐसी चीज बनानी पड़ेगी, जो एक तरफ से आकार वाली हो और दूसरी तरफ से निराकार हो। यही मूर्ति का रहस्य है।

इसे मैं फिर से समझा दूं आपको। कोई ऐसा सेतु बनाना पड़ेगा, जो हमारी तरफ आकार वाला हो और परमात्मा की तरफ निराकार हो जाए। हम जहां खड़े हैं, वहां उसका एक छोर तो मूर्त हो और जहां परमात्मा है, दूसरा छोर उसका अमूर्त हो जाए, तो ही सेतु बन सकता है। अगर वह मूर्ति बिल्कुल मूर्ति है तो फिर सेतु नहीं बनेगा, अगर वह मूर्ति बिल्कुल अमूर्त है तो भी सेतु नहीं बनेगा। मूर्ति को दोहरा काम करना पड़ेगा। हम जहां खड़े हैं, वहां उसका छोर दिखाई पड़े और जहां परमात्मा है, वहां निराकार में खो जाए।

मूर्ति-पूजा शब्द में हम दो शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं-एक पूजा का और एक मूर्ति का- ये दोनों एक ही व्यक्ति के अनुभव में कभी नहीं आते। इनमें मूर्ति शब्द तो उन लोगों का है, जिन्होंने कभी पूजा नहीं की; और पूजा उनका है, जिन्होंने कभी मूर्ति नहीं देखी।

अगर इसे और दूसरी तरह से कहा जाए तो ऐसा कहा जा सकता है कि पूजा जो है, वह मूर्ति को मिटाने की कला है। वह जो मूर्ति है आकार वाली उसको मिटाने की कला का नाम पूजा है। उसके मूर्त हिस्से को गिराते जाना है, गिराते जाना है! थोड़ी ही देर में वह अमूर्त हो जाती है। थोड़ी ही देर में, इस तरफ जो मूर्त हिस्सा था, वहां से शुरुआत होती है पूजा की। और जब पूजा पकड़ लेती है साधक को, तो थोड़ी ही देर में वह छोर खो जाता है और अमूर्त प्रकट हो जाता है।

आप मंदिर के पास से गुजरेंगे तो मूर्ति दिखाई पड़ेगी, क्योंकि पूजा के पास से गुजरना आसान नहीं है। तो आप कहेंगे, इन पत्थर की मूर्तियों से क्या होगा? लेकिन जो उस मंदिर के भीतर कोई एक मीरा अपनी पूजा में लीन हो गई है, वहां कोई भी मूर्ति नहीं बची। पूजा घटित होती है, मूर्ति विदा हो जाती है। मूर्ति सिर्फ प्रारंभ है। जैसे ही पूजा शुरू होती है, मूर्ति खो जाती है।

तो वह जो हमें दिखाई पड़ती है, वह इसीलिए दिखाई पड़ती है कि हमें पूजा का कोई पता नहीं है। और दुनिया में जैसे-जैसे पूजा कम होती जाएगी, वैसे-वैसे मूर्तियां बहुत दिखाई पड़ेंगी। साधारणत: लोग सोचते हैं कि जितना पुराना आदमी होता है, जितना आदिम, उतना मूर्तिपूजक होता है। जितना आदमी बुद्धिमान होता चला जाता है, उतना ही मूर्ति को छोड़ता चला जाता है। सच नहीं है यह बात। असल में पूजा का अपना विज्ञान है। जितना ही हम उससे अपरिचित होते चले जाते हैं, उतनी ही कठिनाई होती चली जाती है।

इस संबंध में एक बात और आपको कह देना उचित होगा। हमारी यह दृष्टि नितांत ही भ्रांत और गलत है कि आदमी ने सभी दिशाओं में विकास कर लिया है। जब हम कहते हैं विकास, तो उससे ऐसा भ्रम पैदा होता है कि सभी दिशाओं में विकास हो गया होगा। आदमी की जिंदगी इतनी बड़ी चीज है कि अगर आप एकाध चीज में विकास कर लेते हैं, तो आपको पता ही नहीं चलता कि आप किसी दूसरी चीज में पीछे छूट जाते हैं।

अगर आज विज्ञान पूरी तरह विकसित है, तो धर्म के मामले में हम बहुत पीछे छूट गए हैं। कभी धर्म विकसित होता है, तो विज्ञान के मामले में पीछे छूट जाते हैं। कभी ऐसा होता है कि एक आयाम में हम कुछ जान लेते हैं, दूसरे आयाम को भूल जाते हैं। और जीवन के सत्य बहुआयामी हैं। एक ही काम बहुत तरह से किया जा सकता है। एक ही काम तक पहुंचने की बहुत विधियां हो सकती हैं।

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