श्रीमदभगवतगीता में भगवान श्री कृष्ण ने जया एकादशी को स्वयं के समान बलशाली बताया

शास्त्रों में माघ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को जया एकादशी बताया गया है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णुजी की विधि-विधान से पूजा करने का विधान है। श्रीमदभगवतगीता में भी परमेश्वर श्री कृष्ण ने इस तिथि को स्वयं के समान ही बलशाली बताया है। इस साल 23 फरवरी (मंगलवार) को जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। पदमपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु की जया एकादशी के दिन पूजा करने से पिशाच योनि का भय नहीं रहता है।

एकादशी तिथि के महत्व को बताते हुए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है-”मैं वृक्षों में पीपल एवं तिथियों में एकादशी हूँ”। एकादशी की महिमा के विषय में शास्त्र कहते हैं कि विवेक के समान कोई बंधु नहीं और एकादशी के समान कोई व्रत नहीं। पदम् पुराण के अनुसार परमेश्वर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व समझाते हुए कहा है कि बड़े-बड़े यज्ञों से भी मुझे उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती जितनी एकादशी व्रत के अनुष्ठान से मिलती है। एकादशी तिथि मनुष्य के लिए कल्याणकारी है अतः सर्वथा प्रयत्न करके एकादशी का व्रत करना चाहिए।

जया एकादशी सब पापों का नाश करने वाली उत्तम तिथि है। इतना ही नहीं, यह ब्रह्मह्त्या जैसे जघन्य पाप तथा पिशाचत्व का भी विनाश करने वाली है। इसका व्रत करने से मनुष्य को कभी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता। पुराणों में इस एकादशी के सन्दर्भ में कहा गया है कि जिसने ‘जया’ का व्रत किया है उसने सब प्रकार के दान दे दिए और सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया। इस व्रत को  करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

इस दिन समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान श्री नारायण की उपासना करनी चाहिए। रोली, मोली, पीले चन्दन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतुफल, मिष्ठान आदि अर्पित कर धूप-दीप से श्री हरि की आरती उतारकर दीप दान करना चाहिए। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप एवं विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना बहुत फलदायी है। इस दिन भक्तों को परनिंदा, छल-कपट,लालच,द्धेष की भावनाओं से दूर  रहकर,श्री नारायण को ध्यान में रखते हुए भक्तिभाव से उनका भजन करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

एक समय माल्यवान नाम का गन्धर्व व पुष्पवन्ती नाम की अप्सरा का इंद्र की सभा में गान हो रहा था । परस्पर अनुराग के कारण दोनों मोह के वशीभूत हो गए व इनके चित्त में भ्रान्ति आ गयी । इसलिए ये शुद्ध गान न गा सके । इंद्र ने इसमें अपना अपमान समझा और कुपित होकर दोनों को पति-पत्नी के रूप में रहते हुए पिशाच हो जाने का श्राप दे दिया । पिशाच योनि को पाकर दोनों हिमालय पर्वत पर भयंकर दुःख भोगने लगे । देवयोग से जया एकादशी के दिन दोनों ने सब प्रकार का आहार त्याग, जलपान तक नहीं किया और पीपल के वृक्ष के निकट बैठकर उन्होंने रात गुज़ार दी  । द्वादशी का दिन आया,उन पिशाचों के द्वारा ‘जया’ के उत्तम व्रत का पालन हो गया । उस व्रत के प्रभाव से व भगवान विष्णु की शक्ति से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई । पुष्पवन्ती और माल्यवान पुनःअपना दिव्य रूप प्राप्त कर स्वर्ग चले गए ।

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