आज गूंजेगी मां सरस्वती की वंदना? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, नियम और उपाय

आज से ऋतुराज वसंत के स्वागत और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की आराधना का महापर्व वसंत पंचमी शुरू हो रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 23 जनवरी 2026 को पूरे देश में यह उत्सव मनाया जाएगा। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी के कमंडल से अमृत की बूंदों के गिरने से विद्या की देवी सरस्वती प्राकट्य हुई थीं।

वसंत पंचमी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि
दृक पंचांग के अनुसार, वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। ज्योतिषीय गणनाओं की मानें तो, इस साल पंचमी तिथि की शुरुआत जानें-

  • सुबह में 7 बजकर 13 मिनट से 8 बजकर 33 मिनट तक
  • सुबह में 8 बजकर 33 मिनट से 9 बजकर 53 मिनट तक
  • सुबह 9 बजकर 53 मिनट से 11 बजकर 13 मिनट तक

पूजा के लिए सबसे शुभ समय ‘पूर्वाह्न’ काल (सुबह का समय) माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट किया गया है कि सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले का समय देवी सरस्वती की आराधना के लिए सर्वोत्तम है।

सरस्वती पूजा की सरल विधि
मां सरस्वती की पूजा में सादगी और शुद्धता का विशेष महत्व है। इस दिन पीले रंग का प्रयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

पीले वस्त्र धारण करें: सुबह स्नान के बाद पीले या सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें।

कलश स्थापना: पूजा स्थान पर मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें और गणेश जी का आह्वान करें।

अर्पण: देवी को पीले फूल (खासकर गेंदा या सरसों के फूल), पीला चंदन, केसरिया अक्षत और पीली मिठाई का भोग लगाएं।

कलम और किताब की पूजा: विद्यार्थी और कलाकार इस दिन अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को मां के चरणों में रखकर उनकी पूजा अवश्य करें।

आरती और वंदना: ‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला…’ मंत्र का जाप करें और अंत में आरती करें।

विशेष मंत्र और लाभ
मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए कुछ प्रभावी मंत्रों का उल्लेख प्राचीन शास्त्रों में मिलता है:

विद्या प्राप्ति मंत्र: “सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी, विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।”

धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मा जी के मुख से सरस्वती का प्राकट्य हुआ था, जिससे संसार को वाणी और सुर मिले। वहीं, आयुर्वेद और पारंपरिक ज्ञान के अनुसार, वसंत ऋतु का यह समय मानसिक एकाग्रता बढ़ाने और नई शुरुआत के लिए सबसे उपयुक्त मौसम होता है। मां सरस्वती की वंदना न केवल मन को शांति देती है, बल्कि यह एकाग्रता और बुद्धि बढ़ाने में भी सहायक मानी जाती है। वसंत पंचमी के दिन इस वंदना का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।

सरस्वती वंदना और उसका अर्थ
संस्कृत श्लोक:

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

सरस्वती वंदना का सरल हिंदी अर्थ:
पहली पंक्ति: जो विद्या की देवी मां सरस्वती कुंद के फूल, चंद्रमा और हिम (बर्फ) के हार के समान धवल (सफेद) हैं और जो शुभ्र (सफेद) वस्त्र धारण करती हैं।

दूसरी पंक्ति: जिनके हाथों में वीणा का सुंदर दंड सुशोभित है और जो श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हैं।

तीसरी पंक्ति: जिनकी वंदना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शंकर) जैसे देवता सदा करते हैं।

चौथी पंक्ति: ऐसी भगवती सरस्वती, जो अज्ञानता और जड़ता को पूरी तरह से मिटा देने वाली हैं, वे मेरी रक्षा करें और मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।

विद्यार्थियों के लिए छोटा और प्रभावी मंत्र
अगर आप पूरी वंदना नहीं कर सकते, तो मां सरस्वती के इस छोटे मंत्र का 11 या 21 बार जाप कर सकते हैं:

“ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः”

पूजा के समय ध्यान रखने योग्य बातें:
एकाग्रता: वंदना करते समय अपना पूरा ध्यान मां सरस्वती की छवि पर केंद्रित करें।

पीले फूल: वंदना के बाद माँ को पीले फूल अर्पित करना बहुत शुभ होता है क्योंकि पीला रंग उत्साह और ज्ञान का प्रतीक है।

प्रसाद: पूजा के बाद बूंदी के लड्डू या केसरिया भात (मीठे पीले चावल) का भोग लगाकर सबको बांटें।

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