हिंदू धर्म में जीवन के सोलह संस्कारों में अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यह वह पड़ाव है, जहां आत्मा का संसार से मोह छूट जाता है। दाह संस्कार के समय कई तरह की रस्म निभाई जाती हैं, जिनमें सबसे अधिक ध्यान खींचती है – ‘मिट्टी का घड़ा फोड़ने’ वाली रस्म। जब शव को मुखाग्नि दी जाती है, तब एक व्यक्ति पानी से भरा मिट्टी का घड़ा लेकर चिता की परिक्रमा करता है और अंत में उसे पीछे की ओर पटक कर फोड़ देता है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस परंपरा के पीछे का रहस्य क्या है? तो आइए जानते हैं।
समानता
गरुड़ पुराण के अनुसार, इसके पीछे कई कारण छिपे हैं। सनातन परंपरा में मानव शरीर की तुलना मिट्टी के घड़े से की गई है। ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम शरीरा।’ जिस तरह मिट्टी का घड़ा कच्चा होता है और आखिरी में मिट्टी में ही मिल जाता है, उसी तरह हमारा शरीर भी है। घड़ा फोड़ना इस बात का प्रतीक है कि अब यह ‘मिट्टी का शरीर’ समाप्त हो चुका है और इसकी आत्मा अब आजाद है।
मोह का त्याग
मृत्यु के बाद भी आत्मा अक्सर अपने परिवार और शरीर के मोह में आसपास ही भटकती रहती है। घड़ा फोड़ने की रस्म आत्मा को यह संकेत देने के लिए की जाती है कि अब उसका इस शरीर से नाता पूरी तरह टूट चुका है। घड़ा फूटने की आवाज और पानी का बह जाना दिखाता है कि जैसे फूटे हुए घड़े में पानी नहीं रुक सकता, वैसे ही अब इस शरीर में आत्मा का कोई स्थान नहीं बचा है।
घड़े में तीन छेदों का रहस्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घड़े के साथ चिता की परिक्रमा करते समय उसमें कुशा या किसी नुकीली वस्तु से तीन छेद किए जाते हैं। ये तीन छेद मनुष्य जीवन के तीन ऋणों – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण की मुक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। जब घड़ा फूटता है, तो माना जाता है कि व्यक्ति इन सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर मिट्टी में विलीन हो गया है।
सभी के लिए सीख
यह रस्म केवल मृतक के लिए नहीं, बल्कि दाह संस्कार के समय मौजूद सभी लोगों के लिए भी एक सीख है। बहता हुआ पानी जीवन की तेजी से बीतती हुई अवधि को दिखाता है और घड़े का फूटना मृत्यु की अटलता को। साथ ही यह ये भी सीख देता है कि सबको एक दिन इसी तरह मिट्टी में मिल जाना है।
Shree Ayodhya ji Shradhalu Seva Sansthan राम धाम दा पुरी सुहावन। लोक समस्त विदित अति पावन ।।