जब शिव को हुआ पछतावा और तोड़ दिया अपना त्रिशूल

shiv-565ed6b9ca63a_l-300x214त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र माना जाता है। इससे वे भक्तों की रक्षा तथा दुष्टों को दंड देते हैं। भारत में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां उनके खंडित त्रिशूल के टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं। आमतौर पर खंडित मूर्ति और उसके अस्त्रों का पूजन करना निषिद्ध होता है लेकिन यहां भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

यह मंदिर जम्मू से करीब 120 किमी की दूरी पर स्थित है। इस इलाके में पटनीटाप के पास सुध महादेव (शुद्ध महादेव) विराजमान हैं। यह शिवजी के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहीं उनके त्रिशूल के तीन टुकड़े हैं।

पास ही मानतलाई नामक स्थान है जिसे पार्वती की जन्मभूमि माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर लगभग 2,800 साल पुराना है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग और शिवपरिवार विराजमान हैं।

कहा जाता है कि मानतलाई से मां पार्वती भगवान शिव का पूजन करने आती थीं। यहां सुधांत नामक एक राक्षस भी शिवजी का पूजन करने आता था। एक दिन जब देवी पार्वती शिव का ध्यान कर रही थीं तब सुधांत उनसे वार्ता करने के लिए आ गया।

जब उन्होंने नेत्र खोले तो सामने सुधांत को देखकर घबरा गईं। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। तब उनकी आवाज सुनकर शिवजी ने कैलाश पर्वत से त्रिशूल फेंका। त्रिशूल का प्रहार सुधांत की छाती पर हुआ। त्रिशूल फेंकने के बाद शिव को पश्चाताप हुआ क्योंकि सुधांत उनका भक्त था।

उन्होंने उसे पुनः जीवनदान देने का फैसला किया लेकिन सुधांत शिव के हाथों से ही मोक्ष पाना चाहता था। उसने शिव को विनम्रता से मना कर दिया।

शिव ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया और यह वरदान दिया कि यह स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्होंने अपने त्रिशूल के तीन टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए। मंदिर के एक स्थान के बारे में कहा जाता है कि वहां सुधांत की अस्थियां रखी हुई हैं।

त्रिशूल के टुकड़ों पर एक प्राचीन लिपि लिखी हुई है। माना जाता है कि इसे अनेक विद्वानों ने पढ़ने का प्रयास किया लेकिन अभी तक इस लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं मिली है।

 

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