हनुमान जी ने एेसा क्या किया कि पत्थर जुड़ने लगे अोर हो गया राम सेतु का निर्माण

सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में श्रीराम द्वारा श्रीलंका पर चढ़ाई के समय रामसेतु निर्माण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि जब श्री राम को लंका जाने के लिए समुद्र पर पुल बनाने की आवश्यकता हुई तो उन्होंने समुद्र देवता से अनुमति लेकर अपनी वानर सेना की सहायता से यह सौ योजन लम्बा पुल बनाया था। श्री राम की सेना लंका के विजय अभियान पर चलते समय जब समुद्र तट पर पहुंची तब विभीषण के परामर्श पर समुद्र तट पर डाब के आसन पर लेटकर भगवान राम ने समुद्र से मार्ग देने का आग्रह किया था। 

महाभारत में भी इस घटना का उल्लेख मिलता है। रामेश्वरम में आज भी श्रीराम की शयन मुद्रा मूर्ति विद्यमान है। समुद्र से रास्ता मांगने के लिए यहीं पर रामचंद्र जी ने तीन दिन तक प्रार्थना की थी। शास्त्रों में श्री राम सेतु के आकार के साथ-साथ इसकी निर्माण प्रक्रिया का भी उल्लेख मिलता है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता हरण के बाद जब श्री राम ने सीता को रावण से छुड़ाने के लिए लंका द्वीप पर चढ़ाई की तो उस वक्त उन्होंने सभी देवताओं का आह्‍वान किया तथा युद्ध में विजय हेतु आशीर्वाद मांगा था। श्री राम ने वरुण देव से समुद्र पार जाने के लिए रास्ता मांगा था। जब वरुण ने प्रार्थना नहीं सुनी तो उन्होंने समुद्र को सुखाने के लिए धनुष उठाया। डरे हुए वरुण ने क्षमा याचना करते हुए उन्हें बताया कि श्री राम की सेना में मौजूद नल-नील नाम के वानर जिस पत्थर पर उनका नाम लिखकर समुद्र में डाल देंगे, वह तैर जाएगा और इस तरह श्री राम की सेना समुद्र पर पुल बनाकर उसे पार कर सकेगी। इसके बाद श्री राम की सेना ने लंका के रास्ते में पुल बनाया और लंका पर हमला कर विजय हासिल की।

स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और ब्रह्म पुराण में भी श्री राम के सेतु का ज़िक्र किया गया है। स्कंद पुराण के ब्रह्मखण्ड में राम सेतु का विस्तार पूर्वक वर्णन है। नैमिषारण्य में ऋषियों के द्वारा जीव मुक्ति का सुगम उपाय पूछने पर सूतजी बताते हैं कि “रामसेतु के दर्शन मात्र से संसार-सागर से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु और शिव में भक्ति तथा पुण्य की वृद्धि होती है।” 

सूतजी शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं कि “सेतु का दर्शन करने पर सब यज्ञों का, समस्त तीर्थो में स्नान का तथा सभी तपस्याओं का पुण्य फल प्राप्त होता है।” 

रामसेतु के क्षेत्र में अनेक तीर्थ स्थित हैं अत: स्कंद पुराण में सेतु यात्रा का क्रम एवं विधान भी वर्णित है। श्री रामचरित मानस में स्वयं भगवान श्रीराम का कथन है कि “जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह कोई परिश्रम किए बिना ही संसार रूपी समुद्र से तर जाएगा।” 

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के 22 वें अध्याय के अनुसार विश्वकर्मा के पुत्र “नल” के नेतृत्व में वानरों ने मात्र पांच दिन में सौ योजन लंबा व दस योजन चौड़ा पुल समुद्र के ऊपर बनाकर श्री राम की सेना के लंका में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। 

स्कंदपुराण व कूर्मपुराण में भगवान शिव का वचन है कि जब तक रामसेतु की आधार भूमि व अस्तित्व किसी भी रूप में विद्यमान रहेगा, तब तक भगवान शंकर सेतु तीर्थ में सदैव उपस्थित रहेंगे। अंन्य ग्रंथों में कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। तेलुगू रामायण “रंगनाथरामायण” में रामसेतु विषय पर दो प्रसंग आते हैं पहले प्रसंग के अनुसार सेतु निर्माण में एक गिलहरी का जोड़ा भी योगदान दे रहा था। यह रेत के दाने लाकर पुल बनाने वाले स्थान पर डाल रहा था। दुसरे प्रसंग अनुसार जब राम-राम लिखने पर पत्थर तैर तो रहे थे परंतु इधर-उधर बह रहे थे। इनको जोड़ने हेतु हनुमानजी ने एक एक पत्थर पर “रा” तो दूसरे पर “म” लिखा। इससे पत्थर जुड़ने लगे व सेतु का काम आसान हो गया।

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