आज माघ मास का पहला प्रदोष है। माघ मास का प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाले रोग, दोष और कष्टों से मुक्ति मिलती है। साथ ही, इस व्रत के फलस्वरूप मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। प्रदोष व्रत का समय और विधि सही ढंग से अपनाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
माघ मास में पड़ने वाला पहला प्रदोष व्रत विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन शिवजी की आराधना, ध्यान और दान-पुण्य करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हुए विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और शिवजी के मंत्रों का उच्चारण करते हैं। आइए जानते हैं कि माघ मास का पहला प्रदोष व्रत 2026 में कब पड़ रहा है और इसे करने की पूरी विधि क्या है।
माघ मास 2026 में शुक्र प्रदोष व्रत
माघ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी 2026 की शाम 08:16 बजे से शुरू होगी और 16 जनवरी 2026 की रात 10:21 बजे तक रहेगी। इस वर्ष शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष को विशेष रूप से शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है। अतः इस दिन श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा-अर्चना, उपवास और दान-पुण्य करने से जीवन में सुख-समृद्धि, वैवाहिक खुशियाँ और मानसिक शांति प्राप्त होती हैं।
शुक्र प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त, अवधि और पारण समय
पूजा मुहूर्त: इस वर्ष शुक्र प्रदोष व्रत 16 जनवरी 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। व्रत का पूजा मुहूर्त शाम 05:47 बजे से शुरू होकर 08:29 बजे तक रहेगा। इस दौरान विधिपूर्वक भगवान शिव की आराधना, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप करना सबसे शुभ माना जाता है।
पूजा अवधि: पूजा की कुल अवधि लगभग 2 घंटे 42 मिनट है। इस समय भक्त अपने घर या मंदिर में शिवजी की विधिपूर्वक पूजा करके व्रत का फल प्राप्त कर सकते हैं।
पारण का शुभ समय: व्रत का पारण अगले दिन, 17 जनवरी 2026, शनिवार की सुबह 06:40 बजे के बाद किया जा सकता है। इस समय व्रत खोलने से व्रत के सभी फल और भगवान शिव का आशीर्वाद पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
प्रदोष व्रत पूजा विधि 2026
प्रात: काल पूजा विधि
माघ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्वच्छ स्नान करें। इसके बाद भगवान शिव की पूजा के लिए बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप और गंगाजल का उपयोग करें। हाथ में जल और पुष्प लेकर पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ व्रत करने का संकल्प लें। दिनभर फलाहार या हल्का उपवास करते हुए शाम का इंतजार करें और प्रदोष काल में विशेष पूजा करें।
प्रदोष काल पूजा विधि
दिनभर उपवास रखने के बाद सूर्यास्त के समय स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ जल या गंगाजल से शुद्ध करें। अब गाय के गोबर की सहायता से मंडप तैयार करें और उसमें पांच अलग-अलग रंगों से रंगोली सजाएँ। पूजा के लिए उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर बैठें।
इसके बाद भगवान शिव के मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें और शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ। इस प्रकार श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा करने से प्रदोष व्रत का फल प्राप्त होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
शुक्र प्रदोष व्रत का महत्व
शुक्र प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित विशेष व्रत है, जो सौंदर्य, वैवाहिक सुख, भोग और धन-सम्पदा की प्राप्ति के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों के लिए कल्याणकारी है। इस दिन व्रत करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, घर में देवी लक्ष्मी का वास होता है और परिवार में शांति व समृद्धि बनी रहती है। प्रदोष व्रत का समय शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि जब त्रयोदशी तिथि और प्रदोष काल एक साथ पड़ते हैं, तब भगवान शिव की आराधना अत्यंत फलदायी होती है।
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