विचारों में सजगता ही है सच्चा ध्यान

हम कभी स्वयं होकर नहीं रहते और अपने जीवन के लक्ष्य से चूक जाते हैं। अत: हमें चाहिए कि अपने कर्मों में सजग हों और जागृत होकर रहें और इसका सरलतम उपाय है ध्यान। इससे जीवन में सफलता मिलती है। हमें सदा याद रखना चाहिए कि ध्यान स्वर्ण-समान अनमोल है।

meditionji_28_01_2016जब हम किसी से प्रश्न करते हैं कि जीवन कैसा चल रहा है तो केवल दुख भरी कथाएं ही सुनने को मिलती हैं। इसका कारण क्या है? बिना सोची-समझी आसक्ति ही हमारे जीवन में दुख को निमंत्रित करती है। क्या हमें इससे कुछ सार्थक भी प्राप्त होता है? अपने परिवार के सदस्यों की हमारी अनवरत चिंता, किसी प्रकार से उन्हें या हमें लाभ पहुंचाती है? वस्तुत: समय की बर्बादी के सिवा इससे कुछ और प्राप्त नहीं होता।

वास्तव में, हम सदा अकेले ही हैं, सबके बीच रहकर भी अकेले हैं, फिर जब अकेले होते हैं तब तो अकेले होते ही हैं। कभी ऐसा भी होता है जब ऐसा न हो? नहीं, फिर भी हम दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। आज हमारा जीवन दूसरों की एक मुस्कान पर आश्रित है।

कोई हमारी ओर देखे, मुस्कुराए तो हम प्रसन्न, अन्यथा निराश हो जाते हैं। इससे हममें या तो आत्महत्या करने की अथवा दूसरे की हत्या कर देने की इच्छा होने लगती है। कितने ही लोगों का सपूर्ण जीवन उन अनेकों अत्याचारों, अन्यायों का बदला लेने के लिए समर्पित होता है, जो उन्हें लगता है उनके साथ हुए हैं।

इस प्रकार, हम कभी स्वयं होकर नहीं रहते और अपने जीवन के लक्ष्य से चूक जाते हैं। अत: हमें चाहिए कि अपने कर्मों में सजग हों और जागृत होकर रहें। और इसका सरलतम उपाय है ध्यान। इससे जीवन में सफलता मिलती है।

हमें सदा याद रखना चाहिए कि ध्यान स्वर्ण-समान अनमोल है। यह सांसारिक समृद्धि, मुक्ति तथा मन:शान्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। कहते हैं कि, ‘ध्यान, जप से दस लाख गुणा बढ़कर है। अर्थात् ध्यान में लगाया गया थोड़ा सा समय लाखों की संया में किए मन्त्र-जप के समान होता है।

आंखें मूंद कर, फर्श पर आलती-पालती लगा कर बैठ जाने का नाम ही ध्यान नहीं होता। अपने कर्मों, विचारों तथा वचनों में सजगता विकसित करना ही सच्चा ध्यान है। विचार पानी की छोटी-छोटी बूंदों के समान हैं, एकत्रित हो जाएं तो वचनों तथा कर्मों की विशाल नदी बन जाते हैं।

एक छोटा सा विचार हमारे भीतर पनप कर, एक विशाल नदी बन कर बाहर बह निकलता है और फिर हमारे वश से बाहर हो जाता है। प्रारंभ होती हुई एक नदी को रोक देना कठिन नहीं है, एक ईंट भी इसके प्रवाह को मोड़ देने के लिए पर्याप्त है।

किन्तु बड़ी होने पर यह हमारे वश की बात नहीं रहती। अत: मेरे बच्चों, हमें अपने विचारों के प्रति बहुत सजग रहना चाहिए। क्योंकि विचार वचन का रूप लेते हैं और फिर वचन कर्म का। फिर इसके प्रवाह की दिशा में परिवर्तन अत्यन्त कठिन हो जाता है।

इसीलिए मैं कहती हूं कि मेरे बच्चों को अपने विचारों, वचन तथा कर्म को लेकर अति सजग रहना चाहिए। इससे जिंदगी जीने में सहायता मिलती है। इससे आपको जीवन में सफलता भी मिलेगी। लेकिन दुख की बात है कि अधिकतर लोग इसओर ध्यान नहीं देते हैं।

यदि सांचा ही बिगड़ जाए तो उसमें डाला गया कोई भी पदार्थ ठीक नहीं बनेगा। उसी प्रकार, यदि हम अपने मन का निर्देशन भली भांति नहीं करते तो इसमें से जो भी आएगा- विचार अथवा वचन, वह अनुचित ही होगा।

अत: सर्वप्रथम अपने मन को संयमित करो और उसका एकमात्र उपाय ध्यान है. ध्यान के माध्यम से हमारा अपने भीतरी मौन से आमना-सामना होता है।मन, वचन और कर्म को पवित्र करता है ध्यान : ध्यान का अयास करना बेहद जरूरी है, क्योंकि ध्यान जीवन का आवश्यक अंग है। इससे हमारे मन-वचन तथा कर्म पवित्र होते हैं. फिर भौतिक समृद्धि भी पीछे-पीछे आ जाती है।

प्रतिदिन थोड़ा सा समय ध्यान के लिए अवश्य रखना चाहिए। इससे सभी को शांति तथा परमात्म-कृपा, दोनों की प्राप्ति होगी। स्मरण रहे कि ध्यान से सपूर्ण विश्व को लाभ होता है।

 
 
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