एक नाग वंशज की जुबानी, नागवंश की अमिट कहानी

नाग’ भारतीय धर्म और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। हमारे धर्म ग्रंतों में नागराज वासुकि, तक्षक नाग, शेषनाग और भी अन्य नागों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भारतीय पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि भारती उप महाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में बसे तक्षशिला का संबंध तक्षक नाग से है।

nag_01_02_2016सदियों पहले तक्षशिला के आस-पास का क्षेत्र नागों का था। धरती का स्वर्ग यानी कश्मीर में आज भी कई शहरों के नाम नागों के नाम से संबोधित किए जाते हैं। श्रीनगर में लगभग 13सौ वर्ष पुराना नगर है। चीनी यात्री ने यह नगर देखा था। इस यात्री के आने से पहले ही तक्षशिला से लेकर नालंदा तक के बौद्ध ग्रंथों में नाग जाति के कुछ लोगों के स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं।

इन्हीं में से एक था नागभट्ट( नाग वंश का छात्र)। वो तक्षशिला विश्वविद्या केंद्र के बुद्धिमान बालक था। उसके साथ उसके दो मित्र श्रीपाद और यशोधर्मन भी पढ़ते थे। तीनों की शिक्षा पूरी होने वाली थी। जब ये तीनों शिक्षा पूरी होने के बाद कुलपति से विदाई और आशीर्वाद लेने पहुंचे, तो कुलपति ने कहा, ‘यदि तुम तीनों एक वर्ष का विशेष अध्ययन कर विश्वविद्यालय केंद्र को सौंप सको तो अच्छा होगा।’

तब तीनों युवक कुलपति से अनुमति लेकर शैक्षणिक यात्रा के लिए निकल पड़े। दो माह बाद वह उज्जैन पहुंचे। उस समय उज्जैन में शबर जाति के लोग रहते थे। वह आगे बढ़े उन्हें एक मंदिर दिखाई दिया। स्थानीय लोगों ने उस मंदिर का नाम हापेश्वर बताया। यह एक शिव मंदिर था, जहां एक कुंड में अनेकों सांप मौजूद थे। तीनों मंदिर के पुजारी से मिले, पुजारी जिसका नाम नागेश था माथे पर भस्म और त्रिपुंड लगाए हुए था।

तीनों विश्राम के लिए वहीं रुक गए। तब कुछ देर बाद नागभट्ट ने अपने दोनों दोस्तों श्रीपाद और यशोधर्मन को नागवंश की कथा सुनाई।

महाभारत से पहले अर्जुन का खांडवदाह और उसमें तक्षक नाग का झुलसना और राजा परीक्षित की मृत्यु की घटना लोगों को पौराणिक इतिहास की तरह याद है। परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के विष से हुई थी। इसलिए उनके पुत्र जनमेजय ने नागयज्ञ करवाया। इस नाग यज्ञ में हजारों नाग मारे गए। ( यह नाग यज्ञ जहां हुआ वहां वर्तमान में मध्यप्रदेश का नागदा शहर बसा हुआ है।) आस्तिक और इंद्र के आने पर तक्षक नाग का कुल बच सका।

इस घटना के बाद तक्षक नाग ने तक्षशिला की नींव रखी। तक्षक भी राजनीति से विरक्त हो चुके थे, वह चाहते थे ज्ञान को एकत्रित करने की तमाम विधियों के बार में काम किया जाए। तक्षक ने कुछ वर्षों तक विश्वविद्यालय खोलने की पहल की जो कुछ समय तक जारी रही। यह सारा ज्ञान संस्कृत में ही लिखा गया। क्योंकि उस समय संस्कृत ही एकमात्र मानक भाषा थी। जो बहुत से कुलों में बोली और लिखी जाती थी।

नाग जाति संस्कृत भाषा को सम्मान इसलिए भी देती थी क्यों कि इसी भाषा ने उनको सम्मानजनक संबोधन नाग दिया है। नाग संस्कृत का शब्द है जिसके तीन अर्थ हैं जो कि क्रमशः पर्वत, फणधारी सर्प और सिंदूर। ये तीनों ही नाग संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।

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